اي باد برو، اگر تواني
شاعر : فخرالدين عراقي
| برخيز سبک، مکن گراني | | اي باد برو، اگر تواني | | درياب حيات جاوداني | | بگذر سحري به کون جانان | | از وي به چه عذر باز ماني؟ | | باري تو نهاي چو من مقيد | | خدمت برسان، چنان که داني | | خاک در او ببوس و از ماش | | چون خدمت من بدو رساني | | دارم به تو من توقع اينک | | گويي به زبان بيزباني: | | گر هيچ مجال نطق يابي | | در جوي تو رايگان، تو داني | | ما تشنه و آب زندگاني | | گر بهتر ازين کني تواني | | با ما نظر عنايت، اي دوست، | | اينک به تو داد زندگاني | | آن دل که به بوي تو همي زيست | | بويي به مشام من رساني | | زنده شوم ار ز باغ وصلت | | بيمن تو خوشي و شادماني | | بي تو نفسي نيم خوش و شاد | | چه سود ز عمر و زندگاني؟ | | چون نيست مرا لب تو روزي | | اي آنکه مرا چو جان نهاني | | بنماي رخت، که جان فشانم | | در پيش رخ تو جان فشاني | | خوشتر بود از حيات صد بار | | آخر نه تو در ميان آني؟ | | مگذار دلم به دست تيمار | | غم ميخوردم به رايگاني | | تقصير نميکند غم تو | | خوشتر ز هزار شادماني | | با اينهمه، هم غم تو ما را | | هر لحظه هزار کامراني | | از ياد لب تو عاشقان را | | آسايش صدهزار جاني | | جانهات فدا، که از لطافت | | چون درنگرم وراي آني | | هر وصف که در ضميرم آيد | | زيرا که تو برتر از بياني | | عاجز شدم از بيان وصفت | | گر بهتر ازين کني تواني | | حال من ناتوان تو داني | | اينک به تو داد زندگاني | | آن دل که به بوت زنده مي بود | | آن هم چو غمت، چنان که داني | | تن ماند کنون و نيم جاني | | بيتو چه خوشي و شادماني؟ | | بيروي تو نيستم خوش و شاد | | بيتو چه خوشي و شادماني؟ | | بي تو سر زندگي ندارم | |
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