| دور درامد به نصيحت گري | | چون بسخن رفت بسي داوري |
| کايزدت از حادثه دارد نگاه ! | | داد نخستش به دعاي پناه |
| داروي تلخش ز نصيحت به کام | | ريخت پس آن گاه به مهر تمام |
| ناز بدو کن که شد او بي نياز | | کاي پسر! از ملک و جواني مناز |
| ز آتش سوزنده نگهدار خس | | خشم بهر جرم مياور بکس |
| عفو نکوتر ز سياست بسي | | چون به گنه معترف آيد کسي |
| سر بزنش پيش که گيرد بري | | وان که برارد به خلافت سري |
| آب ده از زهرهي او دهر را | | خرد مبين دشمن بد زهره را |
| راه مده بي خبران را به خويش | | خاص کن آن را که خرد هست پيش |
| گفت کسان نيز همي دار پاس | | گر چه دلت هست فراست شناس |
| رخصت تدبير شناسان به جوي | | باشد اگر سوي مهميت روي |
| تيغ نشايد که کشي از نيام | | گر شودت خصم به تدبير رام |
| تابودت ملک عمارت پذير | | چشم رعايت ز رعيت مگير |
| بيش کن اين مايه زمان تا زمان | | عدل بود مايهي امن و امان |
| بس در دولت که تواني کشاد | | دادگري کن که ز تاثير داد |
| نشنود آواز تظلم کسي | | تا به زماني که تو بادا بسي |
| جانب دين کوش که آن هم تراست | | دولت دنيا که مسلم تر است |
| نام نکو دولت جاويد بس | | دولت جاويد نبرده ست کس |
| از بد کس ني زبد خود بترس | | پيشه نکوئي کن واز بد بترس |
| تا ز خداوند نماني خجل | | ترس خداوند جهان کن به دل |
| از دريزدان نشوي شرمسار | | کار چنان کن که به هنگام کار |
| صحبت آلوده رها کن به خاک | | باز طلب صحبت مردان پاک |
| تا که به غفلت نرود روزگار | | هوش بران نه که شوي هوشيار |
| پس غم گيتي که خورد ، خود بگو ؟ | | چون تو خوري بادهي کافور بو |
| هر چه ز سلطان نگرند آن کنند | | چون همه کس خدمت سلطان کنند |
| تا نشود رکن شريعت خراب | | کوشش پوشيده کن اندر شراب |
| داد بسي زاد نو از پند خويش | | شاه بدين گونه به فرزند خويش |
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