| نوباوهي غيب گشت رختم | | چون گنج هنر گشاد بختم |
| کرد از همه سو خزنده را تيز | | ارزاني گوهر گران خيز |
| کز سحر قديم نو کنم ساز | | ميخواست بسي دل هوس باز |
| با جادوي رفته هم فسوني | | بيرون دهم از دم دروني |
| گفتم قدمي زدن توانم | | پي بر، پي او، چنانک دانم |
| تسليم همان جريده گشتم | | از شيوهي خود رميده گشتم |
| بر دم ز ميان تکلف خويش | | چيدم به قلم نمونهاي بيش |
| شستم به سلامت و رواني | | آرايش پيکر معاني |
| زين به نتوان نمونه برداشت | | زان سکه که مرد پر هنر داشت |
| ممکن نشديش در ميان فرق | | گر خود به زلال من شدي غرق |
| کان از دل اوست وين ز جانم | | زين پيش تفاوتي ندانم |
| هم هر دو به يکدگر نمانند | | مردم که به زاد توأمانند |
| هم نوع تفاوتي درو هست | | دو خط که نويسي از يکي دست |
| ديگر نتواند آن چنان کرد | | نقاش، که پيکري نشان کرد، |
| طرز سخنت و صرفهي صرف | | مقصود من از بيان اين حرف |
| به زين نتوان ستد به شمشير | | کاقبال کسان به زهرهي شير |
| وز غورهي خويش کني کام | | اي آنکه به مرا نهي نام |
| واندر دف تو هزار روزن | | از من نظرت به چشم سوزن |
| با روي تو بگوي، تا بدانيم | | گر ما ز هنر تهي ميانيم |
| بيهوده چه لافي از «نظامي» | | نبود چو فسانهي تو نامي |
| آن زان ويست، زان تو چيست؟! | | گفتي: دم اوست مرده رازيست، |
| بي گفت تو اعتراف کردم | | گر زان قدح آري آب خوردم |
| کز کيسهي خود بود جوان مرد | | صد رحمت ايزدي بران مرد |
| تا گوش زمانه را کنم باز | | زان کردهام اين نواي خوش ساز |
| ور نيست منش حيات دادم | | زندهست به معني اوستادم |
| بودست بدين متاع در خورد | | آن گنج فشان گنجه پرورد |
| وز شغل زمانه دست شسته | | وانگه ز جهان فراغ جسته |
| کاري نه دگر مگر همين کار | | باري نه به دل مگر همين بار |
| آسودگي تمام بنياد | | گنجي و دلي ز محنت آزاد |
| اسباب معاش را نظامي | | از هر ملکي و نيک نامي |
| از سوختگي، چو ديگ، در جوش | | مسکين من مستمند بي توش |
| در گوشهي غم نگيرم آرام | | شب تا سحر و ز صبح تا شام |
| پيش چو خودي، ستاده بر پاي | | باشم ز براي نفس خود راي |
| وان رنج که من برم، همه باد | | مزدي که دهند، منت داد |
| ريزند جوش، ولي به خواري | | چون خر که علف کشد به زاري |
| يابم ز فراغ دل نشاني | | گر از پس هفتهاي زماني |
| کاونده چه زر برارد از سنگ؟ | | سهلست به فرصتي چنان تنگ، |
| يا رغبت سينه را دهم داد؟ | | ممدوح خجسته را کنم ياد، |
| کان دل دل و گنج بر زبانست | | بخت اين که سخن سبک عنانست |
| گنجينه گشاي کان غيب است | | کلکم که سرش زبان غيب است |
| لبيک زنان دود معاني | | آواز دهد چو در رواني |
| دلالهي فکر مانده بي کار | | از جنبش نظم گرم رفتار |
| بودي قدري خلاص جانم | | گر از تک و پوي آب و نانم |
| آفاق چگونه کردمي پر | | روشن گشتي که از چنين در |
| معلوم کند حد سخن سنج | | با اين همه هر که بيند اين گنج |
| کاغاز صحيفه شد به انجام | | از شکر خداي خوش کنم کام |
| «مجنون ليلي» به عکس اول | | نامش که زغيب شد مسجل |
| سالش نودست و شش صد و هشت | | تاريخ ز هجرت آنچه بگذشت |
| از چشم رضا کند نگاهي | | اميد که هر خرد پناهي |
| انصاف طلب کنم، نه تحسين | | زانکس که نگه کند به تمکين |
| کاراستم اين ورق به خامه | | يارب چو من سياه نامه |
| چشم از تو، بجز بهي ندارم | | هر چند بد آمد اين شمارم |
| بر وي، ز شريعت آفرين نيست | | شعر، ار چه صلاح کار دين نيست |
| انشاء الله که همچنين باد! | | اين نامه، سزاي آفرين باد! |
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