| از صحبت آن نگار موزون | | چون مانع دلرميده مجنون |
| آن در همه فن بزرگ کارش | | يعني پدر بزرگوارش |
| محمل به در خليفه افکند، | | برخاست به مقتضاي سوگند |
| افسانهي خويش را کماهي | | بر خواند به رسم دادخواهي |
| در بيت و غزل بديهه گويي، | | کز «عامريان» ستيزهخويي |
| خود را «مجنون» لقب نهاده، | | از قاعدهي ادب فتاده |
| صد پرده ز عشق ساز کرده | | افکنده ز روي راز پرده |
| از چشمزد زمانه مستور | | دارم گهري يگانه چون حور |
| نبسوده به غير شانه مويش | | جز آينه کس نديده رويش |
| رسوا شدهي دهل دريده | | آن شيفتهراي ديوديده |
| آوازهي او گرفت عالم | | از بس که زند ز عشق او دم |
| کافسانهسراي اين سخن نيست | | در جمله جهان يک انجمن نيست |
| پايش شکنم، به سر درآيد | | بيحلقه زدن ز در درآيد |
| صبحش رانم، قدم زند شام | | گر در بندم، درآيد از بام |
| از بهر خدا به غور من رس! | | جز تو که رسد به غور من کس؟ |
| بنويس به مير آن ولايت | | حرفي دو به خامهي عنايت |
| وين حادثه از سرم کند باز» | | تا قاعدهي کرم کند ساز |
| بنوشت به وفق آن مثالش | | دانست خليفه شرح حالش |
| مرکب سوي قيس و قوم اوراند | | چون مير ولايت آن رقم خواند |
| زد بانگ سران عامري را | | اندخت بساط داوري را |
| اعيان قبيله حلقه بستند | | قيس و پدرش به هم نشستند |
| مضمون وي آنکه: «قيس مجنون | | منشور خليفه کرد بيرون |
| بيرون ننهد قدم ز انصاف! | | کز ليلي و عشق او زند لاف، |
| بر خاک ديار خود نشيند! | | زين پس پي کار خود نشيند! |
| ليليجويان جمل نراند! | | ليليگويان غزل نخواند! |
| لب مهر کند ز گفت و گويش! | | پا بازکشد ز جستجويش! |
| محفل ننهد ز داستانش! | | منزل نکند بر آستانش! |
| وز ذکر وي انجمن نسازد! | | بر خاک درش وطن نسازد! |
| باشد به هلاک خود سزاوار! | | ور ز آنکه کند خلاف اين کار، |
| بر شيشهي هستياش زند سنگ، | | هر کس که کند به قتلش آهنگ |
| سرکوبي عام و خاص نبود! | | بر وي ديت و قصاص نبود! |
| مضمون مثال را شنيدند، | | اين واقعه را چو قوم ديدند |
| چشم شفقت فراز کردند | | بر قيس زبان دراز کردند |
| منشور خليفه را شنيدي؟! | | گفتند که: «غور کار ديدي؟! |
| بالاتر از اين سخن، سخن نيست | | منبعد مجال دمزدن نيست |
| خونت هدر است و مال، يغماست | | گر مينشوي بدين سخن راست |
| زين شيوهي ناصواب بازآي!» | | بر مادر و بر پدر ببخشاي! |
| برداشت نفير عاشقانه | | مجنون ز سماع اين ترانه |
| مصروع آسا ز خويشتن رفت | | هوشش ز سر و توان ز تن رفت |
| در حلقهي ماتمش نشستند | | گردش همه خلق حلقه بستند |
| شد شيوهي داوري دگرگون | | داور ز غمش نشست در خون |
| منشور خليفه را فروشست | | دستور حکومتاش شده سست |
| قانون معاش اهل هوش است، | | کاين نامه که زيرکي فروش است، |
| ديوانه سزاي اين رقم نيست | | جز بر سر عاقلان قلم نيست |
| رخساره نهاده بود بر خاک | | تا دير فتاده بود بر خاک |
| هوشش به نشيد، رهنمون شد | | چون بيهشياش ز سر برون شد |
| شد ساز بدين نشيدش آهنگ: | | با زخمهي عشق ساخت چون چنگ |
| غارتزدگان شاه عشقيم | | «ما گرمروان راه عشقيم |
| پرواي خليفه نيست ما را | | جز عشق وظيفه نيست ما را |
| کوتاه بود خليفه را دست | | ز آن پايه که عشق پاي ما بست |
| بالاي زمين و آسمانيم | | ما طاير سدره آشيانيم |
| از پهلوي ما چه قوت سازد؟ | | ز آن دام که عنکبوت سازد، |
| مهجوري من ز وي محال است! | | هيهات! چه جاي اين خيال است؟ |
| دورست که من شوم ز من دور» | | محوم در وي چو سايه در نور |
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