اي قبلهي جان کجات جويم
شاعر : خاقاني
| جاني و به جان هوات جويم | | اي قبلهي جان کجات جويم | | ور خشم کني رضا جويم | | گز زخم زني سنانت بوسم | | امروز چو کيميات جويم | | ديروز چو افتاب بودي | | امشب همه چو سهات جويم | | دوشت همه شب چو بدر ديدم | | چون روح سبک لقات جويم | | اي در گرانبهاتر از روح | | چون عمر گرانبهات جويم | | وي ماه سبک عنانتر از عمر | | هر صبحدم از صبات جويم | | خورشيدي و برنيائي از کوه | | تا کي ز بر سمات جويم | | تو زير زمين شدي چو خورشيد | | هم ز آبخور ختات جويم | | اي گمشده آهوي ختائي | | از دامگه قضات جويم | | صياد قضا نهاد دامت | | چونت طلبم، کجات جويم؟ | | اي گوهر يادگار عمرم | | در هر صدفي جدات جويم | | دريا کنم اشک و پس به دريا | | از وهم برون چرات جويم؟ | | از ديده نهان درون و همي | | نزديکي و دور جات جويم | | در جاني و ز انس و جانت پرسم | | هم در دل آشنات جويم | | خاقانيت آشناي عشق است | | در معرکهي بلات جويم | | اي صبر که کشتهي فراقي | | در دائرهي عنات جويم | | وي دل که به نيم نقطه ماني | | پر سوخته در هوات جويم | | وي جان که کبوتر نيازي | | در زايجهي فنات جويم | | وي نقش زياد طالع من | | کي در ورق بقات جويم | | چون نقش زياد کس نبيند | | ز آن سوي جهان هبات جويم | | اي مرکب عمر رفته پي کور | | کز نوحهگري نوات جويم | | وي بلبل جغد گشته وقت است | | هم زانوي غم دوات جويم | | اي سينه که دردمندي از غم | | از زخم اجل شفات جويم | | درد تو جراحتي است ناسور | | از جود تو توتيات جويم | | اي تن که به چشم درد آزي | | برگت طلبم، نوات جويم | | چون خوان کرم نماند تا کي | | جان را ديت از دهات جويم | | اي چرخ شريف کش که دوني | | تن را عوض از جفات جويم | | وي خاک عزيز خور به خواري | | از ظل عدم ضيات جويم | | اي روز کرم فرو شدي زود | | در عقهي اژدهات جويم | | اي ماه گرفته نور دانش | | در دخمهي پادشات جويم | | وي روضهي بوستان دولت | | در عالم کبريات جويم | | اي تاج کيان، کيالواشير | | در سايهي آن لوات جويم | | قدر تو لوا زده است بر عرش | | مجدت نگرم، سنات جويم | | ز آن سوي فلک به ديهي وهم | | وز نفس همه ثنات جويم | | از عقل همه هوات خواهم | | تا جان دارم وفات جويم | | رفتي که وفا نکرد عمرت | | زان اول اوليات جويم | | بر تختهي صدق بودي آحاد | | از صفر کجا صفات جويم | | بگذشتي و صفر جاي تو يافت | | از مائده سخات جويم | | قحط کرم است روزي جان | | پرورودنش از عطات جويم | | طفلي است هنر که مادرش مرد | | در زمرهي اصفيات جويم | | گرچه ز ملوک عهد بودي | | فيض از کرم خدات جويم | | امروز که تشنه زير خاکي | | در کوثر مصطفات جويم | | فردا به بهشت گشته سيراب | |
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