| که مسکن دارد آن جان جواني | | بدان رشگ بهشت جاوداني |
| ز خاکش ديدهي جان را جلا ده | | قدم بر آستان دلستان نه |
| بنه در پيش او بر خاک رخسار | | به آزرم از جمالش پرده بردار |
| از اين مسکين بدان خورشيد خوبان | | سلام و بندگيهاي فراوان |
| سلامي کز دمش دل برگشايد | | سلامي کز نسيمش جان فزايد |
| سلامي رشگ گلبرگ بهاري | | سلامي طيرهي مشگ تتاري |
| سلامي خوش چو خوي مهربانان | | سلامي جانفزا چون وصل جانان |
| ز سر تا پاي او بوي دل آيد | | سلامي کز وجودش عشق زايد |
| حديثم عرضه دار از روي ياري | | رسان اي خوش نسيم نوبهاري |
| اسير عشق و هجران گشتهي تو | | بگو ميگويد آن سرگشتهي تو |
| به عشقت در جهان افسانه گشتم | | ز سوداي غمت ديوانه گشتم |
| مراد از کفر و ايمانم تو بودي | | دلارام ودل و جانم تو بودي |
| خيالت روز و شب دمساز من بود | | وصالت همدم و همراز من بود |
| هميکردم به عشرت زندگاني | | به وصلت سال و مه در کامراني |
| چنان مهرت به جان پرورده بودم | | چنان در وصل تو خو کرده بودم |
| جهان برچشم من تاريک گشتي | | که گر يک لحظه بيرويت گذشتي |
| تنم در تاب رفتي سينه در جوش | | به صد زاري برفتي هوشم از هوش |
| بدل خسته به تن رنجورم از تو | | کنون شد مدتي تا دورم از تو |
| چو مجنون بر سر راهم نشاندي | | برفتي و مرا تنها بماندي |
| مرا در غصهي هجران فکندي | | دلم در آتش سوزان فکندي |
| گرفتي چون دل ريشم سر خويش | | نهادي داغ هجران بر دل ريش |
| من اينجا در غم از جان دست شسته | | تو آنجا خرم و شادان نشسته |
| به عزت ميگذاري زندگاني | | تو آنجا در نشاط و شادماني |
| به پيغام تو گوش جان گشاده | | من اينجا ديده بر راهت نهاده |
| بيا بگشاي از دل مشگل من | | کجائي اي مداواي دل من |
| کجات آن در وفا گردن فرازي | | کجات آن هر زمان از دلنوازي |
| که رفتي و مرا کردي فراموش | | کنون عمريست اي سرو قبا پوش |
| ز ملک عافيت آوارهاي هست | | نميگوئي مرا بيچارهاي هست |
| غريبي بيدلي بيخانماني | | اسيري دردمندي مهرباني |
| ز سوداي غمم ديوانه گشته | | ز خويش و آشنا بيگانه گشته |
| کنم جانش ز بند محنت آزاد | | نميگوئي که روزي آرمش ياد |
| به درمانده دلش کامي فرستم | | بدو از لطف پيغامي فرستم |
| به آخر دستشان کردي فراموش | | دل درماندگانرا بردي از هوش |
| فرامشکاري از ياري نباشد | | ز راه و رسم دلداري نباشد |
| به جان آمد دلم در اشتياقت | | بمردم نازنينا در فراقت |
| مرا مپسند در هجران از اين بيش | | بمردم ياد کن وز غم بينديش |
| دلاراما به حق جانسپاري | | نگارينا به حق دوستداري |
| به حق يوسف و حزن زليخا | | به حق صحبت ديرينهي ما |
| به آه و نالهي من ز اشتياقت | | به آب ديدهي من در فراقت |
| مخور بر جان من زنهار زنهار | | که پيمان مشکن و عهدم نگه دار |
| که تا در زندگي يکبار ديگر | | چنان کن اي برخ خورشيد خاور |
| در اقبال بر من برگشايد | | سعادت باز بر من رو نمايد |
| به کام خويشتن پيشت نشينم | | به چشم خويشتن رويت ببينم |
| نبايد بردت از من شرمساري | | بيابم از فراقت رستگاري |
| چو پيغامم سراسر عرضه داري | | صبا از روي لطف و راه ياري |
| بجوي شاديم باز آر آبي | | بخواه از لعل نوشينش جوابي |
| مرا يکبار ديگر زنده درياب | | زماني باز گرد و زود بشتاب |
| ز بويش مغز جانم تازه گردان | | به پيغامش روانم تازه گردان |
| دمت دلبند و جانبخش و جهانگير | | تو تا باز آئيم اي باد شبگير |
| به عادت شيون آغازم دگر بار | | من مسکين سر گردان بييار |
| همي مويم همي گويم به زاري | | ز روي بيدلي و بيقراري |
| نديم و مونس عشاق مسکين | | الا اي باد عنبر بوي مشکين |
| دوا و چارهي هر مستمندي | | شفا و راحت هر دردمندي |
| مداواي به غم پيوستگاني | | علاج سينهي دل خستگاني |
| تو سازي مرهم اميدواران | | تو آري نامه از ياران به ياران |
| مفرح نامهي آوارگاني | | انيس خاطر بيچارگاني |
| کليد شادماني از تو جويند | | حديث درد دلها با تو گويند |
| دمي بازم رهان زين نوحهکاري | | ز روي مردمي وز راه ياري |
| به کوي مهرباني آشنائي | | سحرگاهي گذاري کن به جائي |
| دواي درد بيدرمانم آنجاست | | بدان منزل که شيرين جانم آنجاست |
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