| يا صبا نافهي تتار دميد | | يا نسيم خوش بهار وزيد |
| يا سر زلف يار در جنبيد | | يا سحر باد بوي جان آورد |
| در سر خشک مغز ما گرديد | | اين همه شادي و نشاط و طرب |
| هان که صبح دم سعادتم بدميد | | هين! که گلزار من روان بشکفت |
| ناگهي بر سر مراد رسيد | | دل من از طرب دمي ميجست |
| پاي در دامن سرور کشيد | | دست در گردن نشاط آورد |
| دل ما را ز لطف جان بخشيد | | نفس جانفزاي خوش نفسي |
| سعد دينم به دست داد کليد | | در راحت سراي ميکفتم |
| که چنو سعد کس به چرخ نديد | | سعد چرخ ولا، فرشته صفت |
| بر بسي صوفيان قدس گزيد | | اول او را عنايت ازلي |
| دل او رغبت از جهان در چيد | | بر فلک آستين زهد افشاند |
| در جهان هر چه ناپديد پديد | | پيش چشم ضمير حقبينش |
| اين چنين بندهاي گران نخريد | | به جهان گوهري گرانمايه |
| صحبتش بر همه جهان بگزيد | | دل من کان جهان معني ديد |
| بسکه از لفظش آب لطف چکيد | | ناچشيده شراب مست شدم |
| هم از آن نظم گوهري دزديد | | خاطرم چون نداشت گوهر فضل |
| آن گهر، ليک عقل نپسنديد | | خواست بر نظم او نثار کند |
| بر آن عقد خوش، نه مرواريد | | گفت جان را نثار بايد کرد |
| زانکه جان هم بدان نميارزيد | | جان نکردم نثار و معذورم |
| که بجز سمع حق کسي نشنيد | | و آن دعا آنچنان نهان گفتم |