| که شويند نقش خرد را به مي | | سرم خاک مستان فرخنده پي |
| جهان خرد را به جام شراب | | فروشم چو من مست باشم خراب |
| خوشا وقت مستي و ديوانگي | | چو فتنه است فرهنگ فرزانگي |
| نياري که يک شربه افزون خوري | | هر آبي کز اندازه بيرون خوري |
| هم از خوردن پر گراني بود | | وگر شربت زندگاني بود |
| ني سير چندان که مينوشيش | | بجز مي که بر بوي بيهوشيش |
| به عاشق نوازي فرو ريز مي | | بيا ساقي اندر قدح پي به پي |
| ز تشويش خويشم رهايي دهد | | مي کوبه عشق آشنايي دهد |
| کزو گشت پوسيده عقل سليم | | بيا مطرب آن پردههاي حکيم |
| شود رسته زين عقل ناسودمند | | نوازش چنان کن که جان نژند |
| که شد قرة العين مستانش نام | | بيا ساقيا درده آن خون خام |
| که بيرون رود پند دانا ز گوش | | چنان گوش من پر کن از بانگ نوش |
| چو طفلان ببر گير و به نواز خوش | | بيا مطرب آن جرهي طفل وش |
| بزن چوب تا باز گويد درست | | نوايي که تعليم کرد از نخست |
| که بنياد غم را در آرد ز پاي | | بيا ساقي آن جام شادي فزاي |
| ز خونابهي دهر امانم دهد | | به من ده که راحت به جانم دهد |
| که بي مغزيش مغز را شد دوا | | بيا مطرب آن بر بط خوش نوا |
| به دل جان نوريزد از راه گوش | | بزن تا که بر بايد از مغز هوش |
| که شيريني عيش ريزد به کام | | بيا ساقي آن بادهي تلخ فام |
| که تلخي بسي ديدم از روزگار | | بده تا به شيريني آرم به کار |
| دماغ مرا تر کن از ساز تر | | بيا مطر با برکش آواز تر |
| از آن دست چون ابر باران آب | | روان کن که خشک است رود رباب |
| کزو بزم گردد چو خرم بهار | | بيا ساقي آن شربت خوش گوار |
| گل زرد من زو شود ارغوان | | بده تا چو در تن در آرد توان |
| بدان ار غنون ساز طنبور نام | | بيا مطرب اسباب مي کن تمام |
| مي پر دهد از کدوي تهي | | که گر چون عروسانش در بر نهي |
| که هم کوثرش نام شد هم رحيق | | بيا ساقي آن بادهي چون عقيق |
| خراباتي از وي بهشتي شود | | فرو ريز تا چون بکشتي شود |
| که هم صبح ازو خوش شود هم صبوح | | بيا مطرب آن چاشني بخش روح |
| دل و جان مي خوارگان تازه کن | | فرو گوي و مجلس پر آوازه کن |
| که محتاج جرعه است مرده به خاک | | به جام طرب زنده کن جان پاک |
| که انديشه را در نوردد بساط | | بيا ساقي آن گنج دان نشاط |
| و زو مجلس آراي خسرو کنيم | | بده تا نشاط سخن نو کنيم |
| به نالش درار آن پر آهنگ را | | بيا مطربا ساز کن چنگ را |
| حريفان نگردند محتاج مي | | زهي گير کز ذوق آواز وي |
| که تا اندوه و غم نهم بر کنار | | بيا ساقي آن بادهي خوش گوار |
| که محراب زرتشتيان شد ز باب | | بيا ساقيا ارمغاني شراب |
| کشم آتش غم بدان آب خوش | | بده تا به مستي کنم خواب خوش |
| کند زاهدان را به کوي مغان | | بيا مطرب آن چفته کز يک فغان |
| ز سر نو کند داغ ديرينه را | | چنان زن که آتش زند سينه را |
| که شويد همه تيرگيها ز ذات | | بيا ساقي آن سلسبيل حيات |
| ز آلايش خاک پاکم کشد | | بده تا چو منزل به خاکم کشد |
| که روشن کند جان تاريک را | | بيا مطرب آن علم باريک را |
| که دستار عالم ربايد زسر | | فرو گوي زانگونه سوزان و تر |
| که بي همتان را در آرد به جود | | بيا ساقي آن کيمياي وجود |
| ز گنج سخن در فشاني کنم | | به من ده که تا شادماني کنم |
| ز موي کمانچه نوايي چو موي | | بيا مطربا مو به مو باز جوي |
| گوارا شود مي ز آواز او | | که تا چون به مستان رسد ساز او |
| کزو گوهر مردم آيد برون | | بيا ساقي آن جام در يا درون |
| برو سنگ و گوهر برون آردم | | بده تا نشاطي برون آردم |
| که صوفي کند زو ملامت کشي | | بيا مطرب آن مايهي دل خوشي |
| به مي دلق خود را نمازي کنم | | بگو تا دمي خرقه بازي کنم |
| فرو شوي زين جان خاکي غبار | | بيا ساقي آن بادهي بيخمار |
| نريزد کسي جرعه بر خاک من | | که چون گم شود جان غمناک من |
| برون بر غم از سينههاي نژند | | بيا مطرب آواز بر کش بلند |
| به غلغل در آرا اين کهن طاق را | | ز سر نو کن آيين عشاق را |
| يکي جرعه بر خاک خسرو بريز | | بيا ساقي آن ساغر گرم خيز |
| به من ده که در خورد جام من است | | بيا ساقي آن مي که کام من است |
| حريفان بد را فراموش باد | | مرا با حريفان من نوش باد |
| بسوز اين دل عشق پرورده را | | بيا مطربا ساز کن پرده را |
| به يک زخمه کن کار او را تمام | | رسيد از بتان جان خسرو به کام |