| قبلهي جان چشم تو و ابروي تو | | اي همه ميل دل من سوي تو |
| برده خوابم نرگس جادوي تو | | نرگس مستت ربوده عقل من |
| در خم چوگان ز زلف و گوي تو | | بر سر ميدان جانبازي دلم |
| تا مگر بينم رخ نيکوي تو | | آمدم در کوي اميد تو باز |
| آب حيوان رايگان در جوي تو | | من جگر تفتيده بر خاک درت |
| باز گردم نااميد از کوي تو | | اي اميد من، روا داري مگر؟ |
| من ندارم طاقت بازوي تو | | لطف کن، دست جفا بر من مدار |
| چشم اميدم بمانده سوي تو | | روزگاري بودهام بر درگهت |
| تا مگر يابم زماني بوي تو | | تا مگر بينم دمي رنگ رخت |
| ماندهام در درد بيداروي تو | | چون نديدم رنگ رويت، لاجرم |
| چون فروماندم ز جست و جوي تو | | بر من مسکين عاجز رحم کن |
| ناشده يک لحظه همزانوي تو | | در غم تو روزگارم شد دريغ! |
| از نسيم جان فزاي موي تو | | هم مشام جانم آخر خوش شود |
| تا به کام دل نبيند روي تو | | خود عراقي جان شيرين کي دهد؟ |