| بيرون آمد شترسواري | | آنجا چو رسيد از کناري |
| کاي طلعت تو به فال، ميمون! | | بر وي سر ره گرفت مجنون |
| محمل به کجا همي گشايند؟ | | اين قافله روي در کجاياند؟ |
| در نيت حج بسيج سازند» | | گفتا: «همه روي در حجازند |
| گفتا: «ليلي و آل ليلي!» | | پرسيد: «در آن ميان ز خيلي» |
| زين گفت و شنو گرفت آرام | | مسکين چو شنيد از وي اين نام |
| افتاد بسان سايه بر خاک | | از گرد وجود خويشتن پاک |
| از هستي خويش پاک برخاست | | بعد از چندي ز خاک برخاست |
| مجنون از دور با دل ريش | | ليلي ميراند محمل خويش |
| با محمل او به عشقبازي | | ميرفت رهي به آن درازي |
| خانه به جمال خود بياراست، | | ليلي چو به عزم خانه برخاست |
| خون جگرش ز ديده افتاد | | چشمش سوي آن رميده افتاد |
| درد و غم اشتياق چوني | | بگريست که: «اي فراق ديده! |
| در آتش اشتياق ديده! | | در کشمکش فراق چوني؟ |
| اينک ز دو ديده غرق خونم! | | «من بيتو چه دم زنم که چونم؟ |
| تنها منم و خيال رويت» | | روزان و شبان در آرزويت |
| هم زين سخنان چنانکه داني، | | مجنون به زبان بيزباني |
| چشمي از پيش و چشمي از پس | | ميگفت و ز بيم ناکس و کس، |
| کردند به طوف کعبه آهنگ | | غم بي حد و فرصتي چنين تنگ |
| مجنون ز قفاش سينه پر درد | | ليلي به طواف خانه در گرد، |
| وين يک، به خيال خال او شاد | | آن، سنگ سياه بوسه ميداد، |
| وين کرده به گريه ديده پر نم | | آن برده دهان به آب زمزم، |
| وين جاي به ذروهي وفا داشت | | آن روي به مروه و صفا داشت، |
| وين واقف آن، در آن مواقف | | آن در عرفات گشته واقف، |
| وين در غم شعر مشکفامش | | آن روي به مشعر حرامش، |
| وين بانگ زده که: خون من ريز! | | آن تيغ به دست در مني تيز، |
| وين داشته سر به پيش آن سنگ | | آن کرده به رمي سنگ آهنگ، |
| وين کرده ز بيم هجر فرياد | | آن کرده وداع خانه بنياد، |
| مسند به درون محمل انداخت | | ليلي چو از آن وداع پرداخت |
| جا کرد به پيش محملش چست | | مجنون به ميانه فرصتي جست |
| وز درد ز ديده خون گشادند | | هر دو به وداع هم ستادند |
| چون تن که کند وداع، سر را | | کردند وداع يکدگر را |
| نظام عقود اين حکايت | | سياح حدود اين ولايت |
| کن خاکنشيمن زمين گرد | | زين قصه روايت اينچنين کرد |
| وز گامزدن به سوي ليلي | | چون ماند ز طوف کوي ليلي |
| شوريده به هر ديار ميگشت | | آشفته و بيقرار ميگشت |
| برخاست به کوه و دشتسوزي، | | روزي که سموم نيمروزي |
| طشتي پر از اخگر و شراره | | شد دشت ز ريگ و سنگ پاره |
| ز آن سان که بر آتش اوفتد موي | | حلقه شده مار از او به هر سوي |
| گامي به زمين او نهادي، | | گر گور به دشت رو نهادي |
| پر آبله گشتياش کف پاي | | چون نعل ستور راهپيماي |
| تفسان چو تنورهاي ز آتش | | گيتي ز هواي گرم ناخوش |
| سنگين ديگي پر آب جوشان | | هر چشمه به کوه زو خروشان |
| با روغن داغ، روي تابه | | کردي ماهي ز آب، لابه |
| نخجير کباب و کبک بريان | | هر تختهي سنگ داشت بر خوان |
| در سايهي شاخ خود خزيده | | از سايه گوزن دل بريده |
| در پاي درخت سايه ناياب | | بيچاره پلنگ در تب و تاب |
| ظلمت لختي و نور لختي | | افتاده چو سايهي درختي |
| ز آسيمهسري به وي پنه گير | | گشته به گمان سايه، نخجير |
| انگشت شده ز بس تف و سوز | | مجنون رميده در چنين روز |
| آتش به همه زمانه ميزد | | زو شعلهي دل زبانه ميزد |
| ميسوخت مگر بر آتشاش پاي | | آرام نميگرفت يک جاي |
| بالاي تلي گرفت منزل | | ناگاه چو لاله داغ بر دل |
| از دور بديد خيمهگاهي | | انداخت به هر طرف نگاهي |
| ره جانب خيمهگاه برداشت | | برجست و نفير آه برداشت |