| و آن بانوي کاخ خوبرويي | | آن بانوي حجلهي نکويي |
| آسايش تاج سروري شد، | | چو گوهر سلک ديگري شد |
| وز عاشق خويش منفعل بود | | پيوسته ز کار خود خجل بود |
| کن قصهي درد پيچ در پيچ | | تدبير نيافت غير ازين هيچ |
| از خامهي هر مژه چکيده | | تحرير کند به خون ديده |
| ارسال کند به سوي مجنون | | عنوان همه درد همچو مضمون |
| آن نامهي سينهسوز را کرد | | اين داعيه چون به خاطر آورد |
| تسکين ده بيدلان غمناک | | آغاز به نام ايزد پاک |
| از صورت حال خويش دم زد | | ديباچهي نامه چون رقم زد، |
| همراه تو ني جز آهوي دشت! | | کاي رفته ز همدمان سوي دشت! |
| افتاده به خار و خاره چوني؟ | | از ما کرده کناره چوني؟ |
| خار از کف پاي تو که چيند؟ | | شبها کف پاي تو که بيند؟ |
| همخوان تو کيست جز دد و دام؟ | | خوانت که نهد به چاشت يا شام؟ |
| نبود چو منات به سينه باري | | با اينهمه شکر کن! که باري |
| وز خار ستيزه غنچهام کرد | | دوران چو گلام به ناز پرورد |
| کاري نه به اختيار من بود | | شوهر کردن نه کار من بود |
| ز ايشان به دلم خليد اين خار | | از مادر و از پدر شد اين کار |
| يا بوي تو از صبا شنيدهست، | | هر کس که چو گل رخ تو ديدهست |
| با صحبت هر خسي کند ساز؟ | | کي ديده به هر کسي کند باز؟ |
| سر بر سر من نسوده هرگز | | همخوابهي من نبوده هرگز |
| قانع به نگاهي، آن هم از دور | | گشته ز من خراب، مهجور |
| زين رنج، تنش چو موي باريک | | زين غم، روزش شبيست تاريک |
| نزديک گسستن است آن موي | | وز کشمکش غماش ز هر سوي |
| خوش آنکه برافتد از ميانه | | آن موست حجاب را بهانه |
| خورشيد تو بيسحاب بينم | | تا روي تو بيحجاب بينم |
| آخر چو به بينقابي افتاد، | | نامه که شد از حجاب، بنياد |
| از حلقهي ميم، والسلامش | | زد خاتم مهر، اختتامش |
| قد کرد پي برونشدن راست | | قاصد جويان ز خيمه برخاست |
| نزديک به خيمه، چشمهساري | | بودش خيمه به مرغزاري |
| بنهاد چو چشمه چشم بر راه | | بنشست ولي نه از خود آگاه |
| آمد بيرون، شترسواري | | ناگاه بديد کز غباري |
| اشتر به کنار چشمه خواباند | | دامن ز غبار ره برافشاند |
| کيد ز تو بوي آشنايي!» | | ليلي گفتش که:«از کجايي؟ |
| کحل بصرست خاک نجدم» | | گفتا که: «ز خاک پاک نجدم |
| مجنون لقبي و قيس نامي | | ليلي گفتا که:«تلخکامي، |
| غمديده و سوگوار گردد | | سرگشته در آن ديار گردد |
| امکان زبانگشايياي هست؟» | | هيچات به وي آشنايياي هست؟ |
| سر در کنف وفاي اويام | | گفتا: «بلي آشناي اويام |
| تسکين دل از خداش جويم» | | هر جا باشم دعاش گويم |
| گفتا که:«ز درد عشق زارست! | | ليلي گفتا که: «در چه کارست؟» |
| با وحش رميده آرميده» | | همواره ز مردمان رميده |
| داني که به عشق کيست دربند؟» | | ليلي گفتا که:«اي خردمند! |
| هر دم راند ز ديده سيلي» | | گفتا:« آري، به ياد ليلي |
| و اسرار نهان ز دل برون ريخت | | ليلي ز مژه سرشک خون ريخت |
| و آن نام من است بر زبانش | | گفتا که: «منم مراد جانش |
| کز من خبري به وي رساني، | | جانم به فدات! اگر تواني |
| و آري سوي من جواب آن باز، | | آيين وفا گري کني ساز |
| شمعي ببري، چراغي آري» | | دردي ببري و داغي آري |
| کاي مجنون را دل از تو پردرد! | | برخاست به پاي، آن جوانمرد |
| کالاي تو را به جان فروشم | | منت دارم، به جان بکوشم |
| وآن نامه ز جيب خويش بگشاد | | شد ليلي را درون ز غم شاد |
| برگ کاهي و تار مويي | | پيچيد در آن به آرزويي |
| چون مو زارم، چو کاه زردم! | | يعني: ز آن روز کز تو فردم، |
| بر ناقهي رهنورد بنشست | | چون نامهبر آن گرفت، برجست |
| مايل به قرارگاه مجنون | | شد راحلهتاز راه مجنون |
| بسيار دويد از چپ و راست | | آنجا چو رسيد بيکم و کاست |
| دستور خرد به باد داده | | ديدش که چو مستي اوفتاده |
| بيدار، ولي ز خويش رسته | | در خواب نه، ليک چشم بسته |
| وز دايرهي سپهر بيرون | | از گردش ماه و مهر بيرون |
| وز هر چه نه عشق در گذشته | | مستغرق بحر عشق گشته |
| تا بو که به وي تواند آميخت | | قاصد هرچند حيله انگيخت |
| از بانگ بلند آزمودش | | آن حيله نداشت هيچ سودش |
| در کوه فکند ازآن صدايي | | برداشت چو حاديان نوايي |
| و آن دلشده را ندا همي کرد | | ليلي گويان حدا همي کرد |
| و آمد به خود از سماع آن نام | | کرد آن اثري در او سرانجام |
| زين نام مراد تو کدام است؟» | | گفتا:«تو کهاي و اين چه نام است؟ |
| خاص نظر قبول ليلي» | | گفتا که: «منم رسول ليلي |
| وز مشک و گلاب لب نشسته، | | گفتا که: «ره ادب نجسته |
| گستاخ، چرا شماري اين نام؟» | | هر دم به زبان چه آري اين نام؟ |
| گويا شده ترجمان اويام | | زد لاف که:« من زبان اويام |
| يک رشحه ز نوک خامهي اوست» | | خيزان، بستان! که نامهي اوست |
| پا ساخت ز فرق سر چو خامه | | مجنون چو شنيد نام نامه |
| بوسيد و به چشم خويش ماليد | | چون بر سر نامه نام او ديد، |
| خاصيت چشم و گوش رفته | | افتاد ز عقل و هوش رفته |
| اين نغمهي شوق کرد آغاز | | آمد چو ز بيخودي به خود باز |
| زو در دل تنگ صد گشادست | | کاين نامه که غنچهي مرادست |
| مرقوم به خامهي سعادت | | حرزيست به بازوي ارادت |
| تومار بلا کشيدگان است | | تعويذ دل رميدگان است |
| سر برزد از او نواي ديگر | | وآن دم که گشاد نامه را سر، |
| وز باغ امل بنفشهزاري ست | | کاين نامه نه نامه، نوبهاريست |
| بر صفحهي آرزو کشيده | | دلکش رقميست نورسيده |
| ره ساخته بر زمين کافور | | صفهاست کشيده عنبرين مور |
| برده دل بيدلان چو دانه | | هر موري از آن به سوي خانه |
| بود از مي ذوق و حال يک ظرف | | ز آن نامهي دلنواز هر حرف |
| از جا جستي و رقص کردي | | هر جرعهي مي کز آن بخوردي |
| در گردن جان حمايلاش ساخت | | از خواندن نامه چون بپرداخت |
| زو کرد جواب نامه درخواست | | قاصد چو بديد آن به پا خاست |
| در اول نامه اين رقم زد: | | مجنون چو به نامه در، قلم زد |
| عنوان صحيفهي معاني | | «ديباچهي نامهي اماني |
| کز وي در هر سبب گشايد | | جز نام مسببي نشايد |
| زنجيريساز پاي تدبير | | مطلقگردان دست تقدير |
| سر برتر از آسمان فرازد | | آن را که به وصل چاره سازد، |
| صد شعله به خرمنش فروزد» | | و آن را که ز هجر سينه سوزد، |
| گشت از دل ريش رازپرداز | | چون بست زبان ازين سرآغاز |
| ز آزرده دلي به دلنوازي | | کاين هست صحيفهي نيازي |
| پر عطر وفا ز خامهي تو | | آن دم که رسيد نامهي تو |
| در سينه به جاي جان نهادم | | بر ديدهي خونفشان نهادم |
| از ديده سرشک خون فشاندم | | هر حرف وفا ز وي که خواندم |
| صد تخم فريب کشته بودي | | در وي سخنان نوشته بودي |
| غمهاي مرا بسي فزودي | | غمخواري من بسي نمودي |
| نيد به زبان تو بجز راست، | | گيرم که تو دوري از کم و کاست |
| هر لحظه اسير صد گمان است | | مسکين عاشق چو بدگمان است |
| هر پشهي مرده زنده پيليست | | هر شبهه به پيش او دليليست |
| کو دانه ز بام يار چيند، | | مرغي که به بام يار بيند |
| کز غير به دوست نامه آريست | | ز آن مرغ به خاطرش غباريست |
| وز فکر کنار بر کنارم! | | گفتي که: به بوسه دل ندارم |
| همصحبت توست کام و ناکام؟ | | اين درد نه بس که صبح تا شام |
| وز غصه به معرض زوال است | | گفتي که: ز درد پايمال است |
| بر باد هوا چو دود رفتن! | | خواهد ز ميانه زود رفتن |
| کالاي تو را چه کم خريدار؟ | | گر او برود تو را چه کم، يار؟ |
| محروم از آن همين منم، بس! | | ممکن بود از تو کام هر کس |
| گر دوست ندارمش نه نيکوست | | آن را که تو دوست داري، اي دوست! |
| از من نسزد بجز نکويي | | با هر که تو دوستدار اويي |
| آن به که رضاي دوست خواهد | | عاشق که براي دوست کاهد |
| در راه مراد او شتابد | | از خواهش خويش رو بتابد |
| يک بار ندادهاي مرادم، | | هر چند که من نه از تو شادم، |
| گيتي همه بر مراد بادت! | | خاطر ز زمانه شاد بادت! |
| ور من ميرم تو را بقا باد! | | دمسازي دوستان تو را باد! |