| دستان زن اين سرود دلکش | | رامشگر اين ترانهي خوش |
| کن مانده به چنگ غم گرفتار، | | بر عود سخن چنين کشد تار |
| از تاب حرارت تموزي، | | روزي به هواي نيمروزي |
| يعني که به سايهي مغيلان | | ره برده به خيمهي ذليلان |
| ميکرد به هر طرف نگاهي | | برساخت از آن نظاره گاهي |
| ز ايشان در و دشت گشته معمور | | ناگاه بديد قومي از دور |
| صد خيمه و بارگاه بر پاي | | کردند به يک زمان در آن جاي |
| با جمع ستارگان يکي ماه | | ز آن خيمه گهاش نمود ناگاه |
| ز آن مرحله رو به دشت کردند | | کز خيمه هواي گشت کردند |
| يکديگر را تمام ديدند | | آن دم که به پيش هم رسيدند |
| با او ز زنان قوم خيلي | | مسکين مجنون چه ديد؟ ليلي! |
| بيخود برجست و بيخود افتاد | | چشمش چو بر آن سهيقد افتاد |
| ليلي به سرش دويد حالي | | شد کالبدش ز هوش خالي |
| خونابه فشان ز سينهي ريش | | بنهاد سرش به زانوي خويش |
| زود آوردش به خواب خيزي | | ز آن خواب خوش از گلابريزي |
| بردند ملال يکدگر را | | ديدند جمال يکدگر را |
| هر در سخن که بود سفتند | | هر راز کهن که بود گفتند |
| کس سوختهدل مباد ازين داغ | | در وقت وداع کاندرين باغ |
| کامروز ميان صد غم و سوز | | مجنون گفتا که:«اي دلافروز! |
| من بعد کي و کجات بينم؟» | | بگذاشتي اندر اين زمينام، |
| خواهم هم ازين زمين گذشتن | | گفتا که: «به وقت بازگشتن |
| از ديدن من به کام باشي» | | گر زآنکه درين مقام باشي، |
| چون مردهتني ز جان جدا ماند | | اين رفت ز جاي و او به جا ماند |
| از منزل خويشتن نجنبيد | | بر موجب وعدهاي که بشنيد |
| ننشست درختوار از پاي | | در حيرت عشق آن دلاراي |
| مرغان به سرش نشسته لختي | | ميبود ستاده چون درختي |
| مو رفته چو شاخههاش در هم | | يکجا چو درخت پاش محکم |
| مرغي به سرش گرفت خانه | | عهدي چو گذشت در ميانه |
| از گوهر بيضه شد مرصع | | مويش چو بتان مشکبرقع |
| مرغان سرود عشق پرداز | | برخاست ز بيضهها به پرواز |
| ليلي به ديار خويش برگشت | | يکچند براين نسق چو بگذشت |
| وز ناقه فروگرفت محمل، | | آمد چو به آن خجستهمنزل |
| ديدش ز حساب عقل بيرون | | آمد به سر رميده مجنون |
| نمد به وجود خويشتن باز | | هر چند نهفته دادش آواز |
| بنگر به وفا سرشتهي خويش! | | زد بانگ بلند کاي وفا کيش! |
| بيهوده به سوي من چه آيي؟ | | گفتا :«تو کهاي و از کجايي؟ |
| کام دل و رونق روانت! | | گفتا که: «منم مراد جانت! |
| اينجا شده پايبست اويي» | | يعني ليلي که مست اويي |
| در من زده آتشي جهانسوز | | گفتا: «رو! رو! که عشقت امروز |
| ديگر نشوم شکار صورت! | | برد از نظرم غبار صورت |
| معشوقي و عاشقي برون ماند | | عشقام کشتي به موج خون راند |
| از صبر و قرار ماند تنها | | ليلي چو شنيد اين سخنها |
| بنشست و به هايهاي بگريست | | دانست يقين، که حال او چيست |
| در ورطهي عشق ما فتاده! | | گفت: «اي دل و دين ز دست داده! |
| افتاده به جاودانبلايي! | | ناديده ز خوان ما نوايي! |
| وز دور جمال هم ببينيم» | | مشکل که دگر به هم نشينيم |
| ماتم گري فراق برداشت | | اين گفت و ره وثاق برداشت |
| ميرفت و به آب ديده ميگفت: | | از سينه به ناله درد ميرفت |
| سرچشمهي عيش، ناگوارست | | «دردا! که فلک ستيزه کارست |
| دور از غم روزگار بوديم | | ما خوش خاطر دو يار بوديم |
| وز يکديگر جدا فتاديم | | از دست خسان ز پا فتاديم |
| من دور از وي، چو موي باريک | | او دور از من، به مرگ نزديک |
| من، کرده به تنگناي غم خوي | | او، کرده به وادي عدم روي |
| افتاده به خون و خاک، بي من | | او، بر شرف هلاک، بي من |
| ناچيزتر از خيال، بي او | | من، درصدد زوال، بي او |
| دل بنهادم به هجر جاويد» | | امروز بريدم از وي اميد |
| بر نيت کوچ، بست محمل | | اين گفت و شکسته دل ز منزل |
| منزل به نشيمن دگر کرد | | مجنون هم ازين نشيمن درد |
| بار خود از آن زمين به در برد | | چون وعدهي دوست را به سر برد |
| با گور و گوزن گشت دمساز | | برخاست چنانکه بود از آغاز |