| وي فخر همه قبيلهي آبي | | اي قبلهي کوي خاکي و آبي |
| جز مثل که اين يکي نمييابي | | اي يافته هرچه جسته از گيتي |
| پوشيده لباسهاي سيمابي | | اجرام ز رشک پايهي قدرت |
| با آتش فتنه سالها آبي | | عدل تو ز روي خاصيت کرده |
| خورشيد همي کند سطر لابي | | بر چرخ ز بهر اختياراتت |
| درگاه تواند سال محرابي | | کرده صف اختران گردون را |
| ايمن شده از مجال قلابي | | دارالضربي است کرد و گفت تو |
| چون باد به وقت عفو بشتابي | | چون خاک به گاه خشم بشکيبي |
| مهدي شده نامزد به بوابي | | درگاه تو باب اعظم عدلست |
| انجم چو کبوتران مضرابي | | ز آسيب تو از فلک فرو ريزند |
| تعليم توان ستد رسن تابي | | از کار عدوت چون روان گردد |
| نشنيدستي ز سيم اعرابي | | از سيم مخالفت سخا نايد |
| هم اسلافي مرا هم اعقابي | | تاريخ تفاخرست تشريفت |
| اين گنبد زود گرد دولابي | | زوداکه به دلوشان فرو دادست |
| چون بخت مخالفت به خوش خوابي | | اي چشم نيازيان ز جود تو |
| رخ کرده جلالت تو عنابي | | گفتم که به شکر آن پديد آيم |
| زودا که عنان به عجز برتابي | | گفتا ز گراني رکاب من |
| با آنکه تو از وراي اين بابي | | فتحالبابي بکردم آخر هم |
| ايام چو تيرهاي پرتابي | | تا هست ز شصت دور در سرعت |
| طينت قصبي و طبع مهتابي | | خصم تو و دور چرخ او بادا |
| وز غصه رخش چو چهرهي آبي | | چون دانهي نار اشک بدخواهت |
| در جمله نه صنعتي نه اسبابي | | اسباب بقات ساخته گردون |