| وه وه که شمايلت چه نيکوست | | اي سرو بلند قامت دوست |
| هر سرو سهي که بر لب جوست | | در پاي لطافت تو ميراد |
| در زير قبا چو غنچه در پوست | | نازک بدني که مينگنجد |
| که فرق کند که ماه يا اوست؟ | | مه پاره به بام اگر برآيد |
| نه باغ ارم که باغ مينوست | | آن خرمن گل نه گل که باغست |
| يا بوي دهان عنبرين بوست | | آن گوي معنبرست در جيب |
| بيچاره دل اوفتاده چون گوست | | در حلقهي صولجان زلفش |
| ميميرد و همچنان دعاگوست | | ميسوزد و همچنان هوادار |
| در گردن ديدهي بلاجوست | | خون دل عاشقان مشتاق |
| کاخر دل آدمي نه از روست | | من بندهي لعبتان سيمين |
| کاندر پي او مرو که بدخوست | | بسيار ملامتم بکردند |
| اين شرط وفا بود که بيدوست | | اي سخت دلان سست پيمان |
| دنبالهي کار خويش گيرم | | بنشينم و صبر پيش گيرم |
| بس عهد که بشکنند و سوگند | | در عهد تو اي نگار دلبند |
| خاطر که گرفت با تو پيوند | | ديگر نرود به هيچ مطلوب |
| همچون مگس از برابر قند | | از پيش تو راه رفتنم نيست |
| شوق آمد و بيخ صبر برکند | | عشق آمد و رسم عقل برداشت |
| مادر به جمال چون تو فرزند | | در هيچ زمانهاي نزادست |
| و اندوه فراق کوه الوند | | با دست نصيحت رفيقان |
| از دوست به ياد دوست خرسند | | من نيستم ار کسي دگر هست |
| وين صبر که ميکنيم تا چند؟ | | اين جور که ميبريم تا کي؟ |
| چون گرگ به بوي دنبه در بند | | چون مرغ به طمع دانه در دام |
| بيبند نگيرد آدمي پند | | افتادم و مصلحت چنين بود |
| باشد که چو مردم خردمند | | مستوجب اين و بيش ازينم |
| دنبالهي کار خويش گيرم | | بنشينم و صبر پيش گيرم |
| در شهر مگر تو ميکني بس | | امروز جفا نميکند کس |
| در بند تو دوستان محبس | | در دام تو عاشقان گرفتار |
| من جمرتها السراج تقبس | | يا محرقتي بنار خد |
| خوشبوي کند اذا تنفس | | صبحي که مشام جان عشاق |
| استأنسه و ان تعبس | | استقبله و ان تولي |
| ديگر چه کني قباي اطلس؟ | | اندام تو خود حرير چينست |
| در وصف شمايل تو آخرس | | من در همه قولها فصيحم |
| ترسم ننهي تو پاي بر خس | | جان در قدمت کنم وليکن |
| کاين حسن وفا نکرد با کس | | اي صاحب حسن در وفا کوش |
| فرياد دل شکستگان رس | | آخر به زکات تندرستي |
| ورنه به خدا که من ازين پس | | من بعد مکن چنان کزين پيش |
| دنبالهي کار خويش گيرم | | بنشينم و صبر پيش گيرم |
| ما أطيب فاک جل باريک | | گفتار خوش و لبان باريک |
| شرم آمد و شد هلال باريک | | از روي تو ماه آسمان را |
| والله قتلتني بهاتيک | | يا قاتلتي بسيف لحظ |
| چندين نکنند بر مماليک | | از بهر خدا، که مالکان، جور |
| ترک تو بريخت خون تاجيک | | شايد که به پادشه بگويند |
| لايأت بمثلها اعاديک | | داني که چه شب گذشت بر من؟ |
| هم روز شود شبان تاريک | | با اينهمه گر حيات باشد |
| کم تزجرني و کم اداريک | | فيالجمله نماند صبر و آرام |
| اي دل تو مرا نميگذاري ک | | دردا که به خيره عمر بگذشت |
| دنبالهي کار خويش گيرم | | بنشينم و صبر پيش گيرم |
| بس فتنه که با سر دل آرد | | چشمي که نظر نگه ندارد |
| خود را به هلاک ميسپارد | | آهوي کمند زلف خوبان |
| و آن دست که نقش مينگارد | | فرياد ز دست نقش، فرياد |
| شيرين صفتي برو گمارد | | هرجا که مولهي چو فرهاد |
| تا تخم مجاهدت نکارد | | کس بار مشاهدت نچيند |
| ناپخته مجاز ميشمارد | | ناليدن عاشقان دلسوز |
| گر سوخته خرمني بزارد | | عيبش مکنيد هوشمندان |
| تيغيش بران که سر نخارد | | خاري چه بود به پاي مشتاق؟ |
| کاو حاجت کس نميگزارد | | حاجت به در کسيست ما را |
| من ميروم او نميگذارد | | گويند برو ز پيش جورش |
| گر دست ز دامنم بدارد | | من خود نه به اختيار خويشم |
| دنبالهي کار خويش گيرم | | بنشينم و صبر پيش گيرم |
| غير از تو به خاطر اندرم نيست | | بعد از طلب تو در سرم نيست |
| وز پيش تو ره که بگذرم نيست | | ره ميندهي که پيشت آيم |
| هرچند که ميکشي پرم نيست | | من مرغ زبون دام انسم |
| گويند که هست باورم نيست | | گر چون تو پري در آدميزاد |
| جز ياد تو در تصورم نيست | | مهر از همه خلق برگرفتم |
| ميکوشم و بخت ياورم نيست | | گويند بکوش تا بيابي |
| گر جهد کنم ميسرم نيست | | قسمي که مرا نيافريدند |
| چون حظ نظر برابرم نيست | | اي کاش مرا نظر نبودي |
| وز گوشهي صبر بهترم نيست | | فکرم به همه جهان بگرديد |
| اکنون که طريق ديگرم نيست | | با بخت جدل نميتوان کرد |
| دنبالهي کار خويش گيرم | | بنشينم و صبر پيش گيرم |
| کاندر طلب هوا نگردي؟ | | اي دل نه هزار عهد کردي |
| بر تيغ زدي و زخم خوردي | | کس را چه گنه تو خويشتن را |
| از دعوي عشق روي زردي؟ | | ديدي که چگونه حاصل آمد |
| يا قصهي عشق درنوردي | | يا دل بنهي به جور و بيداد |
| کز فکر سرم سپيد کردي | | اي سيم تن سياه گيسو |
| دوران سپهر لاجوردي | | بسيار سيه، سپيد کردست |
| با ما تو هنوز در نبردي | | صلحست ميان کفر و اسلام |
| اقرار به بندگي و خردي | | سر بيش گران مکن، که کرديم |
| هم دردي و هم دواي دردي | | با درد توام خوشست ازيراک |
| دل موضع صبر بود و بردي | | گفتي که صبور باش، هيهات |
| ورنه به کدام جهد و مردي | | هم چاره تحملست و تسليم |
| دنبالهي کار خويش گيرم | | بنشينم و صبر پيش گيرم |
| در پاي کشان، ز کبر دامن | | بگذشت و نگه کرد با من |
| در پيش و به حسرت از قفا من | | دو نرگس مست نيم خوابش |
| گر با همه آن کني که با من | | اي قبلهي دوستان مشتاق |
| در پاي تو ريزد اولا من | | بسيار کسان که جان شيرين |
| از دست تو پيش پادشا من | | گفتم که شکايتي بخوانم |
| جرم از طرف تو بود يا من؟ | | کاين سخت دلي و سست مهري |
| گر بانگ برآرم از جفا من | | ديدم که نه شرط مهربانيست |
| دست از تو نميکنم رها من | | گر سر برود فداي پايت |
| حاجت که بخواهم از خدا من | | جز وصل توام حرام بادا |
| پرهيز ندانم از قضا من | | گويندم ازو نظر بپرهيز |
| بييار صبور بود تا من | | هرگز نشنيدهاي که ياري |
| دنبالهي کار خويش گيرم | | بنشينم و صبر پيش گيرم |
| انگشت نماي آل آدم | | اي روي تو آفتاب عالم |
| بويت نفس مسيح مريم | | احياي روان مردگان را |
| بر جسم شريفت اسم اعظم | | بر جان عزيزت آفرين باد |
| اي سرو روان به ابروي خم | | محبوب مني چو ديدهي راست |
| بس دل ببري به کف و معصم | | دستان که تو داري از پريروي |
| خلقي متعشقند و من هم | | تنها نه منم اسير عشقت |
| بگذار حديث ما تقدم | | شيرين جهان تويي به تحقيق |
| صبر از تو نميشود مسلم | | خوبيت مسلمست و ما را |
| وز جانب ما هنوز محکم | | تو عهد وفاي خود شکستي |
| دور از تو به انتظار مرهم | | مگذار که خستگان بميرند |
| من بيتو گمان مبر که يکدم | | بيما تو به سر بري همه عمر |
| دنبالهي کار خويش گيرم | | بنشينم و صبر پيش گيرم |
| با حسن وجود آن گل اندام | | گل را مبريد پيش من نام |
| مانند هلال از آن مه تام | | انگشتنماي خلق بوديم |
| يا قوم الي متي و حتام؟ | | بر ما همه عيبها بگفتند |
| ديگر مزنيد سنگ بر جام | | ما خود زدهايم جام بر سنگ |
| اي دولت خاص و حسرت عام | | آخر نگهي به سوي ما کن |
| پختيم و هنوز کار ما خام | | بس در طلب تو ديگ سودا |
| تا خود به کجا رسد سرانجام | | درمان اسير عشق صبرست |
| باشد که تو بر سرم نهي گام | | من در قدم تو خاک بادم |
| ممکن نشود بر آتش آرام | | دور از تو شکيب چند باشد؟ |
| ميپيچم و سخت ميشود دام | | در دام غمت چو مرغ وحشي |
| چون کام نميدهي به ناکام | | من بي تو نه راضيم وليکن |
| دنبالهي کار خويش گيرم | | بنشينم و صبر پيش گيرم |
| چشمت به کرشمه چشمبندي | | اي زلف تو هر خمي کمندي |
| کز چشم بدت رسد گزندي | | محرام بدين صفت مبادا |
| در تو رسد آه دردمندي | | اي آينه ايمني که ناگاه |
| بر روي چو آتشست سپندي | | يا چهره بپوش يا بسوزان |
| عاقل نشود به هيچ پندي | | ديوانهي عشقت اي پريروي |
| اي تنگ شکر بيار قندي | | تلخست دهان عيشم از صبر |
| زيباست ولي نه هر بلندي | | اي سرو به قامتش چه ماني؟ |
| بر گريه زنند ريشخندي | | گريم به اميد و دشمنانم |
| تا ديدهي دشمنان بکندي | | کاجي ز درم درآمدي دوست |
| باري سوي ما نظر فکندي؟ | | يارب چه شدي اگر به رحمت |
| من بعد بر آن سرم که چندي | | يکچند به خيره عمر بگذشت |
| دنبالهي کار خويش گيرم | | بنشينم و صبر پيش گيرم |
| آوخ که ز دست شد عنانم | | آيا که به لب رسيد جانم |
| کز هستي خويش درگمانم؟ | | کس ديد چو من ضعيف هرگز |
| يکباره بسوز و وارهانم | | پروانهام اوفتان و خيزان |
| ور جور کني سزاي آنم | | گر لطف کني بجاي اينم |
| جز نام تو نيست بر زبانم | | جز نقش تو نيست در ضميرم |
| يادت چو شکر کند دهانم | | گر تلخ کني به دوريم عيش |
| اوصاف تو پيش کس نخوانم | | اسرار تو پيش کس نگويم |
| وز دست تو مخلصي ندانم | | با درد تو ياوري ندارم |
| من کشتهي سر بر آستانم | | عاقل بجهد ز پيش شمشير |
| به زان نبود که تا توانم | | چون در تو نميتوان رسيدن |
| دنبالهي کار خويش گيرم | | بنشينم و صبر پيش گيرم |
| يا سبزه به گرد چشمهي نوش | | آن برگ گلست يا بناگوش |
| با قامت چون تويي در آغوش | | دست چو مني قيامه باشد |
| من سرو نديدهام قباپوش | | من ماه نديدهام کلهدار |
| ميآرد و جد و ميبرد هوش | | وز رفتن و آمدن چه گويم؟ |
| پسته، دهن تو گفت خاموش | | روزي دهني به خنده بگشاد |
| عشق آمد و گفت زرق مفروش | | خاطر پي زهد و توبه ميرفت |
| کم هستي خويش شد فراموش | | مستغرق يادت آنچنانم |
| بنشين و صبور باش و مخروش | | ياران به نصيحتم چه گويند |
| عيبم مکن ار برآورم جوش | | اي خام من اينچنين بر آتش |
| وانگه به ضرورت از بن گوش | | تا جهد بود به جان بکوشم |
| دنبالهي کار خويش گيرم | | بنشينم و صبر پيش گيرم |
| عشقت که ز خلق مينهفتم | | طاقت برسيد و هم بگفتم |
| زآن روز که با غم تو جفتم | | طاقم ز فراق و صبر و آرام |
| کز فرقت تو دمي نخفتم | | آهنگ دراز شب ز من پرس |
| دارم که به گريه سنگ سفتم | | بر هر مژه قطرهاي چو الماس |
| من خود ز حيات در شگفتم | | گر کشته شوم عجب مداريد |
| چندانکه کناره ميگرفتم | | تقدير درين ميانم انداخت |
| خاک قدمش به ديده رفتم | | دي بر سر کوي دوست لختي |
| تا در قدم عزيزش افتم | | نه خوارترم ز خاک بگذار |
| صبر از دل ريش گفت رفتم | | زانگه که برفتي از کنارم |
| بيما چه کني؟ به لابه گفتم | | ميرفت و به کبر و ناز ميگفت |
| دنبالهي کار خويش گيرم | | بنشينم و صبر پيش گيرم |
| خون شد دل ريش از اشتياقت | | باري بگذر که در فراقت |
| گويي شکرست در مذاقت | | بگشاي دهن که پاسخ تلخ |
| روزي اگر افتد اتفاقت | | در کشتهي خويشتن نگه کن |
| پروانه صفت در احتراقت | | تو خنده زنان چو شمع و خلقي |
| تا خيمه زنيم در وثاقت؟ | | ما خود ز کدام خيل باشيم |
| عيني نظرت و ما اطاقت | | ما اخترت صبابتي ولکن |
| دريا و نميرسد به ساقت | | بس ديده که شد در انتظارت |
| بيخوابي کشت در تياقت | | تو مست شراب و خواب و ما را |
| نه طاقت آنکه در فراقت | | نه قدرت با تو بودنم هست |
| دنبالهي کار خويش گيرم | | بنشينم و صبر پيش گيرم |
| از من دل و صبر و يار برگشت | | آوخ که چو روزگار برگشت |
| وآن شوخ به اختيار برگشت | | برگشتن ما ضرورتي بود |
| خو کرد و چو روزگار برگشت | | پرورده بدم به روزگارش |
| آن روز که غمگسار برگشت | | غم نيز چه بودي ار برفتي |
| صبر از دل بيقرار برگشت | | رحمت کن اگر شکستهاي را |
| سر کوفتهاي چو مار برگشت | | عذرش بنه ار به زير سنگي |
| آنکس که هم از کنار برگشت | | زين بحر عميق جان به در برد |
| نتوانم ازين ديار برگشت | | من ساکن خاک پاک عشقم |
| داني چه کنم چو يار برگشت؟ | | بيچارگيست چارهي عشق |
| دنبالهي کار خويش گيرم | | بنشينم و صبر پيش گيرم |
| دست خوش روزگار دون نيست | | هر دل که به عاشقي زبون نيست |
| بر چهره دوان سرشک خون نيست | | جز ديدهي شوخ عاشقان را |
| سودا مکن آخرت جنون نيست | | کوته نظري به خلوتم گفت |
| کت آتش غم در اندرون نيست؟ | | گفتم ز تو کي برآيد اين دود |
| از سوزش سينهاي برون نيست | | عاقل داند که نالهي زار |
| کس را به خلاص رهنمون نيست | | تسليم قضا شود کزين قيد |
| آرام دل از يکي فزون نيست | | صبر ار نکنم چه چاره سازم؟ |
| در قبضهي او چو من زبون نيست | | گر بکشد و گر معاف دارد |
| سيماب، که يکدمش سکون نيست | | داني به چه ماند آب چشمم؟ |
| يا بود و به بخت ما کنون نيست | | در دهر وفا نبود هرگز |
| گفتم مگرش وفاست چون نيست | | جان برخي روي يار کردم |
| دنبالهي کار خويش گيرم | | بنشينم و صبر پيش گيرم |
| از روي تو پرده بر نينداخت | | در پاي تو هرکه سر نينداخت |
| آن مرغ که بال و پر نينداخت | | در تو نرسيد و پي غلط کرد |
| تا جان چو پياده در نينداخت | | کس با رخ تو نباخت اسبي |
| آن را که چو شمع سر نينداخت | | نفزود غم تو روشنايي |
| در باخت سر و سپر نينداخت | | بارت بکشم که مرد معني |
| خون خورد و سخن به در نينداخت | | جان داد و درون به خلق ننمود |
| از بهر تو در خطر نينداخت | | روزي گفتم کسي چون من جان |
| صيد از تو ضعيفتر نينداخت | | گفتا نه که تير چشم مستم |
| روزي سوي ما نظر نينداخت | | با آنکه همه نظر در اويم |
| بر من فکند، و گر نينداخت | | نوميد نيم که چشم لطفي |
| دنبالهي کار خويش گيرم | | بنشينم و صبر پيش گيرم |
| صد پيرهن از محبتت چاک | | اي بر تو قباي حسن چالاک |
| افتادن آفتاب بر خاک | | پيشت به تواضعست گويي |
| خاک درت از جبين ما پاک | | ما خاک شويم و هم نگردد |
| کس بر تو توان گزيد؟ حاشاک | | مهر از تو توان بريد؟ هيهات |
| تا دست بدارمت ز فتراک | | اول دل برده باز پس ده |
| اميد و ز کس نيايدم باک | | بعد از تو به هيچکس ندارم |
| زهر از قبل تو محض ترياک | | درد از جهت تو عين داروست |
| هجران تو ورطهاي خطرناک | | سوداي تو آتشي جهانسوز |
| موي تو چه جاي مار ضحاک؟ | | روي تو چه جاي سحر بابل؟ |
| دامن ندهد به دست ادراک | | سعدي بس ازين سخن که وصفش |
| هرگز نرسد به گرد افلاک | | گرد ارچه بسي هوا بگيرد |
| ميبينم و حيله نيست الاک | | پاي طلب از روش فرو ماند |
| دنبالهي کار خويش گيرم | | بنشينم و صبر پيش گيرم |
| بادام چو چشمت اي پسر ني | | اي چون لب لعل تو شکر ني |
| جز در رخ تو مرا نظر ني | | جز سوي تو ميل خاطرم نه |
| مثل تو به چابکي دگر ني | | خوبان جهان همه بديدم |
| چون تو دگري به هيچ قرني | | پيران جهان نشان ندادند |
| چون قد خوش تو يک سجر ني | | اي آنکه به باغ دلبري بر |
| و ز وصل تو ذرهاي ثمر ني | | چندين شجر وفا نشاندم |
| و ز درد دلم تو را خبر ني | | آوازهي من ز عرش بگذشت |
| از آمدن تو خود اثر ني | | از رفتن من غمت نباشد |
| اي راحت جان من، و گر ني | | باز آيم اگر دهي اجازت |
| دنبالهي کار خويش گيرم | | بنشينم و صبر پيش گيرم |
| برخيز و بيا به سوي صحرا | | شد موسم سبزه و تماشا |
| هرجا که نشست خاست غوغا | | کان فتنه که روي خوب دارد |
| ديوانهي عشق گشت و شيدا | | صاحبنظري که ديد رويش |
| ديوانه حديث مرد دانا | | داني نکند قبول هرگز |
| من بي تو خسم کنار دريا | | چشم از پي ديدن تو دارم |
| خارست نخست بار خرما | | از جور رقيب تو ننالم |
| تا مينشوي ز غير رسوا | | سعدي غم دل نهفته ميدار |
| زنهار مرو ازين پس آنجا | | گفتست مگر حسود با تو |
| روزي دو براي مصلحت را | | من نيز اگرچه ناشکيبم |
| دنبالهي کار خويش گيرم | | بنشينم و صبر پيش گيرم |
| از ماه شب چهارده ضو | | بربود جمالت اي مه نو |
| گر جلوهکنان روي چنين رو | | چون ميگذري بگو به طاوس |
| بعد از تو، حکايتست و مشنو | | گر لاف زني که من صبورم |
| چشمي ز پيت فتاده در گو | | دستي ز غمت نهاده بر دل |
| يا از دل طالبان برون شو | | يا از در عاشقان درون آي |
| بنياد وجود ما کن و رو | | زين جور و تحکمت غرض چيست؟ |
| الله يقيک محضر السو | | يا متلف مهجتي و نفسي |
| نگرفت حديث من به يک جو | | با من چو جوي نديد معشوق |
| بيني که شود به خلعتي نو | | گفتم کهنم مبين که روزي |
| مه طلعت آفتاب پرتو | | در سايهي شاه آسمان قدر |
| گر مينرسد به گوش خسرو | | وز لطف من اين حديث شيرين |
| دنبالهي کار خويش گيرم | | بنشينم و صبر پيش گيرم |