| منزل اندر نهاد مجدالدين | | آيت مجد آيتي است مبين |
| ز آل ياسين چو از نبي ياسين | | سيد و صدر روزگار که هست |
| نيست در ملک آسمان و زمين | | مير بوطالب آنکه مطلوبش |
| وانکه در ذات او کرم تضمين | | آنکه در شان او ثنا منزل |
| توسن روزگار بار سرين | | آنکه بيداغ طوع او نکشد |
| خازن کوهسار مهر دفين | | وانکه از چرخ جود او بشکست |
| بر توان چيدن از زمين پروين | | راي او دامن ار بيفشاند |
| جو اول دهد به عليين | | جاه او مرکب ار برون راند |
| قدر او شاه و آسمان فرزين | | حلم او جوهرست و خاک عرض |
| باس او بر خلقته من طين | | بسته دست خلقتني من نار |
| کبک پرور برآورد شاهين | | امر او با عناد کردن طبع |
| روز بد را قفا کند ز جبين | | نهي او باس تيزه رويي چرخ |
| کسوت صورت از نهاد جنين | | برکشد زور بازوي سخطش |
| عزمش از مسرع شهور و سنين | | به مقاصد هميشه پيش رسد |
| خرد آنرا جدا نکرد از اين | | قدرتش با قدر مقارن شد |
| شير و مي را ز يکدگر تعيين | | خود چو ممزوج شد چگونه کند |
| حاش لله نه زانکه نيست متين | | راي او را متين نيارم گفت |
| ادب آن بيافتم در حين | | زانکه يک بار جنس اين گفتم |
| شعر خود را به مدح او تزيين | | اندرين روزها که ميدادم |
| عقل را سخت شد بر ابرو چين | | نکتهاي راندم از رزانت راي |
| وصف آن راي اين بود که رزين | | گفت خامش چه جاي اين سخنست |
| پيش او آفتاب را تمکين | | آفتابيست کاسمان نکند |
| تيغش از آفتاب فروردين | | آسماني که در اثر بيش است |
| چرخ و طبعت نپروريد قرين | | اي بجايي که در هزار قران |
| راز حزمت نهان ز شک و يقين | | اوج قدرت و راي پست و بلند |
| درج نطق ترا به در ثمين | | بحر طبع تو کرده مالامال |
| نوع کلک ترا به سحر مبين | | فحل وهم تو کرده آبستن |
| عقل را در مضيقها تلقين | | طوطي کلک راست گوي تو کرد |
| اشهب و ادهم جهان را زين | | رايض بخت کاردان تو کرد |
| آب و حيوان و آتش برزين | | اي نمودار رحمت و سخطت |
| که خدايش مغيث باد و معين | | دان که در خدمت بساط وزير |
| چون جواني خوش و چو جان شيرين | | عيش من بنده پار عيشي بود |
| دولتم را زمانه زير نگين | | گفتم از غايت تنعم هست |
| گوشهي مسکن من مسکين | | کار برگشت و غم به سکنه گرفت |
| دهر بر عيش من گشاد کمين | | چرخ در بخت من کشيد کمان |
| در چنان دار و گير و هيناهين | | ميکند رخنه نظم حال مرا |
| حصن ملکي چو حصن چرخ حصين | | لگد فتنهاي که رخنه کند |
| نتوان گفتنت بيا و ببين | | دارم اکنون چنان که دارم حال |
| بنماند هميشه نيز چنين | | چتوان کرد اگر چنان بنماند |
| که نه مهرش به موضع است و نه کين | | حالي از چور آسمان باري |
| که نديدست هيچ حادثه بين | | آن همي بينم از حوادث سخت |
| تا تهي دارم از يسار يمين | | نشناسم همي يمين ز يسار |
| در همه خان و مان نه غث و سمين | | عرصه تنگست و بند سخت و مرا |
| کاضطراب مرا دهد تسکين | | مکرمي نيست در همه عالم |
| شب سترون شد آسمان عنين | | گوييا از توالد احرار |
| سرانگشت جز فرا تحسين | | توکن احسان که ديگران نکنند |
| پاي بر پايهي الوف و مائين | | خود گرفتم کنند و نيز نهند |
| ار سبک سنگم ار گران کابين | | بهر انگشت کايد اندر سنگ |
| همچو هنگامه گير و راهنشين | | خويشتن پيش ناکسان و کسان |
| هم در اين بيشه بوده شير عرين | | گربهي به بيوس نتوان بود |
| اين نخستين شناس و باز پسين | | شعر من بنده در مديح به بلخ |
| زلف شمشاد و عارض نسرين | | تا عروس بهاره جلوه کند |
| تازه چون گل نه چون بنفشه حزين | | بادي اندر بهار دولت خويش |
| طربانگيزتر ز ماء معين | | آب آتش نماي در جامت |
| که خداوند حافظست و معين | | جاهت اندر امان حفظ خداي |