| ولکن من هداه الله افلح | | خليلي الهدي انجي و اصلح |
| حکيمان پند درويشان پذيرند | | نصيحت نيکبختان گوش گيرند |
| که ثخني عاقلي ده بار اثنزت | | گش ايها داراغت خاطر نرنزت |
| من استأسرت لاتکسر يديه | | من استضعفت لاتغلظ عليه |
| که اي فربه مکن بر لاغران زور | | چه نيکو گفت در پاي شتر مور |
| کوايش مي بني دنبل مزش نيش | | که منعم بيمبر کول ايچ درويش |
| فقوسالدهر لم تبرح سهامه | | دع استنقاص من طال احترامه |
| تو را نيز ار بيندازد چه داني | | جراحت بند باش ار ميتواني |
| نه هر کش تير نه کمان بو کسي اي کشت | | ببات اين دهر دون را تير اري پشت |
| تواضع ترتفع لاتعل تندم | | تأدب تستقم لاطف تقدم |
| که بخشودست و ديگر در ربودست | | که دوران فلک بسيار بودست |
| بسم دي که سوري ماند بيده ببدشت | | نه کت تفسير وفق خواند است ابهشت |
| ولا يستهزکم من قائم زل | | ليعف المهتدي عن س من ضل |
| که ترسيدم که روزي خود بيفتم | | منم کافتادگان را بد نگفتم |
| مخن هر دم براي چنداکي بگريت | | کمسسکي اوت اس بخت آو بهريت |
| فلا تکثر حبيبک لا يملک | | متي زرت الفتي غبا اجلک |
| چو کم بينند خاطر بيش خواهد | | ز بسيار آمدن عزت بکاهد |
| که ديدر زر ملال آرد بش از بش | | عزيزي کت هناش هر دم مدوپش |
| ولا تحسد غنيا قدره زاد | | تبصر في فقير يشتهي الزاد |
| تو پاي روستايي در وحل بين | | وگر گويند آن جاه و محل بين |
| تزان مسکي خبر هن کش خه نان ني | | و چه ترش روي کت برغ خوان ني |
| سل الجوعان کيف الخبز وحده | | تلقفت الشوا و البقل بعده |
| که قدر نعمت او داند که چونست | | بپرس آن را که جسم از ناقه خونست |
| نن تي گلشکر هن غت بگريت | | غرش نان هاجه از حلوا نپرست |
| عن الحطاب في واد عقنقل | | افق يا من تلهي حول منقل |
| تو ميتندي که مرغم نيست بر خوان | | فقير از بهر نان بر در دعاخوان |
| که مسکيني و سرما گسنه خفتست | | چه داند اي کش سه پخ خوردست و تقتست |
| و ان خلفت محبوسا تندمت | | تحب المال لو احببت قدمت |
| اگر مردي ده و بخش و خور و پوش | | منه گر عقل داري در تن و هوش |
| پشيمان به که نم خو توشه بسته | | نوا که بيفته از هنجار و رسته |
| تفکر يا معني في مالک | | صرفت العمر في تحصيل مالک |
| که چندي خورد و چندي توشه برداشت | | کسي از زرع دنيا خوشه برداشت |
| که گردم کرد نخرم يا نبخشم | | که مپسندت که مو خو از غصه بکشم |
| کمصباح علي قبرالمجوسي | | بهاء الوجه مع خبث النفوس |
| درون مردار و بيرون مشک و کافور | | به گور گبر ماند زاهد زور |
| اگور جدمنت کش در به از تو | | کعارف باد بکاند از جمه نو |
| اذا قالوا لک اکفر لاتعارض | | متي عاشرت محلوقي العوارض |
| چو رفتي در بغل نه دست تدبير | | مرو با ژندهپوشان شام و شبگير |
| که پاکش خورد ديک تي چه او کند | | چنان تزدم دوت کت خون خه اوکند |
| لعل القوم فيهم ذو کرامه | | وجد يا صاح و اکفف من ملامه |
| که گرد مرديست هم زيشان به در نيست | | مگو در نفس درويشان هنر نيست |
| شنه ميان زز بخت صاحب قبولي | | کاحسان بکنه واهروي اصولي |
| بمأجور له قدر ففصل | | نعما قال خياط بموصل |
| نگه کن کاين سخن هر جا توان گفت؟ | | سخن سهل است بر طرف زبان گفت |
| کجمي ميبري خهتر ورانداز | | غراز مو ميشنه واهر کس مگوي راز |
| حذارا منه ان ينسي جميلک | | خفي السر لاتودع خليلک |
| که گر دشمن شود بيم هلاکست | | مگو با دوست ميگويم چه باکست |
| که غت دشمن ببوت ات ببلسد پوست | | تو از دشمن بترسي غافل از دوست |
| اذا لم تحتمل بطش الملاعب | | يقول الراجز ابني لا تلاعب |
| تو در ني بستهاي آتش مينداز | | چه خوش گفت آن پسر با يار طناز |
| مزم تش کت قلاشي نتوتن اشنفت | | کري مم دي که ايرو واجوني گفت |
| قل اللهم نور قبر سعدي | | ان استحسنت هذا القول بعدي |
| کند در کار درويشي دعايي | | چه باشد گر ز رحمت پارسايي |
| بگي رحمت و سعدي باکش اي گفت | | کخيرت بوازي ثخني کت اشنفت |