| آب آتش ريخت رنگ روي تو | | باد عنبر برد خاک کوي تو |
| هيچ دولتخانه چون ابروي تو | | جاودان را نيست اندر کل کون |
| گيسه داري چون خم گيسوي تو | | کفر و دين را نيست در بازار عشق |
| کام و لب خشکست و سرد از خوي تو | | چشم و دل ترست و گرم از عشق تو |
| حلقهاشان حلقههاي موي تو | | اي بسا خلقا که اندر بند کرد |
| آن دو چشم بلعجب بر روي تو | | گر بهشتي نيست پس جادو چراست |
| بي ضيا چشمست از داروي تو | | عالمي را دارويي جز چشم را |
| بست همچون مهره بر بازوي تو | | تا دل ريش مرا دست غمت |
| دين و دنيا را به تار موي تو | | کافرم چون چشم شوخت گر دهم |
| از کلوخ امرود و شفتالوي تو | | دل چو نار و رخ چو آبي کردهام |
| هست محراب سنايي سوي تو | | هر کسي محراب دارد هر سويي |
| ديدهي شوخ خوش جادوي تو | | اي بسا شرما که برد از چشمها |
| با چنان دست و دل و بازوي تو | | کي توانم پاي در عشقت نهاد |
| ناف آهو نشمرد آهوي تو | | سگ به از عقل منست ار عقل من |