| حاجت صد هزار ... قوي | | \N |
| شد ز ... روا که مابوني | | \N |
| گر چه از خواسته چو قاروني | | حاجب من روا نگشت از تو |
| \N | | پس چو به بنگرم بر تو و من |
| آدمي را دو بلا کرد رهي | | من کم از ... و تو کم از ... |
| يا کند پر شکم خويش ز نان | | برد از هر دو بلا روسيهي |
| به خداي ار گل بهار بوي | | يا کند پشت خود ز آب تهي |
| راستان رستهاند روز شمار | | با کژي خوارتر ز خار بوي |
| اندر اين رسته رستگاري کن | | جهد کن تا تو ز آن شمار بوي |
| اي سنايي به گرد شرک مپوي | | تا در آن رسته رستگاري بوي |
| خنصر وسطي اين دو انگشت است | | آنچه گويد مگوي عقل مگوي |
| از زمانه اگر امان جويي | | هر دو از بهر نفس در تک و پوي |
| اين که گويي تو خرد حاتم راد | | زو بلندي مجوي پستي جوي |
| اي روي زردفام تو بر گردن نزار | | وانکه گويي بزرگ سرگين شوي |
| آنگه که مادر تو ترا داشت در شکم | | همچون بلندني که بود بر بلنديي |
| نه ماه رنجت از چه کشيد او که بعد از آن | | هر ساعتي ز رنج زمين را بکنديي |
| ملکا ذکر تو گويم که تو پاکي و خدايي | | از کس همي فگند که از کون فگنديي |
| همه درگاه تو جويم همه از فضل تو پويم | | نروم جز به همان ره که توام راه نمايي |
| تو زن و جفت نداري تو خور و خفت نداري | | همه توحيد تو گويم که به توحيد سزايي |
| نه نيازت به ولادت نه به فرزندت حاجت | | احد بي زن و جفتي ملک کامروايي |
| تو حکيمي تو عظيمي تو کريمي تو رحيمي | | تو جليل الجبروتي تو نصير الامرايي |
| بري از رنج و گدازي بري از درد و نيازي | | تو نمايندهي فضلي تو سزاوار ثنايي |
| بري از خوردن و خفتن بري از شرک و شبيهي | | بري از بيم و اميدي بري از چون و چرايي |
| نتوان وصف تو گفتن که تو در فهم نگنجي | | بري از صورت و رنگي بري از عيب و خطايي |
| نبد اين خلق و تو بودي نبود خلق و تو باشي | | نتوان شبه تو گفتن که تو در وهم نيايي |
| همه عزي و جلالي همه علمي و يقيني | | نه بجنبي نه بگردي نه بکاهي نه فزايي |
| همه غيبي تو بداني همه عيبي تو بپوشي | | همه نوري و سروري همه جودي و جزايي |
| احد ليس کمثله صمد ليس له ضد | | همه بيشي تو بکاهي همه کمي تو فزايي |
| لب و دندان سنايي همه توحيد تو گويد | | لمن الملک تو گويي که مر آن را تو سزايي |
| لب و دندان سنايي همه توحيد تو گويد | | مگر از آتش دوزخ بودش روي رهايي |