| آنکه دستور شاه راست غلام | | دوش سلطان چرخ آينه فام |
| چون به دست غروب داد زمام | | از کنار نبردگاه افق |
| گوشوار فلک ز گوشهي بام | | ديدم اندر سواد طرهي شب |
| قرةالعين و فخر آل نظام | | گفتم آن نعل خنگ دستورست |
| که نهد خنگ او به ما بر گام | | آسمان گفت کاشکي هستي |
| آسمان با دريغ و درد تمام | | گفتم آن چيست پس بگو برهان |
| گفتم آوخ هلال ماه صيام | | گفت ربي و ربک الله گوي |
| بر بساط وزير شرب مدام | | گفت آري مدام نتوان کرد |
| روزکي چند احتماء طعام | | شبکي چند احتباس شراب |
| نوبت فاتحه است والانعام | | همچو انعام تا کي از خور و خواب |
| جاي آن طيرگي در آن هنگام | | طيره گشتم ازو والحق بود |
| از سراي سپهر مينافام | | ماه چون در حجاب مينوشد |
| واندران خيمه درج کرده خيام | | خيمهاي ديدم از زمانه برون |
| همه آتش لباس و آب اندام | | مجمعي از مخدرات درو |
| ساکنان را مسير بيفرجام | | سکنهشان را مدار بيآغاز |
| گشته از اشتياق بيآرام | | تير در هجر چهرهي زهره |
| به کفي بربط و به ديگر جام | | زهره در پيش چشم بهمن و دي |
| تخت خورشيد زير سايهي شام | | تيغ مريخ پيش صيقل قلب |
| ماهي مشتري بجسته ز دام | | دلو کيوان در اوفتاده به چاه |
| منع را خصموار کرده قيام | | توامان در ازاء ناوک قوس |
| بره مذبوح خنجر بهرام | | حدي مفتون خوشهي گندم |
| کام بگشاده تا بيابد کام | | اسد اندر کمين کينهي ثور |
| جز مراد لام و غبن کرام | | در ترازوي چرخ چيزي نه |
| زير پي درکشيده بود و خرام | | جويبار مجره را سرطان |
| بر زبان رقم به وجه پيام | | هر زماني مسير کلک شهاب |
| دادي از راز روزگار اعلام | | ساکنان سواد مسکون را |
| که دهد ملک را قرار و نظام | | راست همچون مسير کلک وزير |
| بر ازو ذوالجلال والاکرام | | صاحب آن ذوالجلالتين که هست |
| صدر اسلام و اختيار انام | | افتخار انام ناصر دين |
| رايتش را ملازمست مدام | | صاهربن مظفر آنکه ظفر |
| نقش تصوير نطفه در ارحام | | آنکه از بهر خدمتش بندد |
| گوهر نظم و نثر در اوهام | | آنکه از بهر مدحتش زايد |
| نه ز نقصان نشان گذاشت نه نام | | آن تمامي که روز استغناش |
| به طفيل بقاي او ايام | | متصل مدتي که باقي شد |
| وانکه عفوش بهانهي انعام | | آنکه خشمش طلايهي زحمت |
| سايهها را ز نور رايش وام | | آنکه خورشيد آسمان بگزارد |
| درجهد برق خاطرش به غمام | | ژاله خورشيد شعله بارد اگر |
| خط باطل کشيد بر احکام | | آسمان در ازاء حکم روانش |
| آسمان باري از کجا و کدام | | دور او آنگه آسمان را حکم |
| وز شکوه تو نان حادثه خام | | اي ز پاس تو تيره آب ستم |
| حادثه خنجرست و حبس نيام | | تيغ باس تو تا کشيده شدست |
| چون عطاي خداي جود تو عام | | چون جلاي خداي جاي تو خاص |
| انتقامت چو خاک خونآشام | | اصطناعت چو آب جانپرور |
| عاشق خدمتت خواص و عوام | | شاکر نعمتت وضيع و شريف |
| لوح داغ تو شانهي دد و دام | | زير طوق تو گردون شب و روز |
| سدهي ساحت ترا ابرام | | بيزمين بوس نور و سايه نداد |
| چکند چرخ کت نباشد رام | | که بود دهر کت نبوسد خاک |
| با عرق راز مجرمان ز مسام | | جذب عدلت به خاصيت بکشد |
| عدل باشد بلي دليل دوام | | بر دوام تو عدل تست دليل |
| ديت کشتگان خود اغنام | | بانفاذت ز گرگ بستاند |
| نکند تلخ نااميدي کام | | تشنگان زلال لطفت را |
| حشر ناممکن است روز قيام | | کشتگان سموم قهر ترا |
| ور بود در حريم بيت حرام | | خون خصمت حلال دارد چرخ |
| گوشهي بالش ترا به سلام | | خاضع آيد کلاه گوشهي عرش |
| به سعادت همي کنند الهام | | فيض عقلت نفوس انجم را |
| که چه پرها بريختند اوهام | | عاليا پايهي مديح تو واي |
| دست نطقم ز آستين کلام | | من کيم تا به آستانش رسد |
| بس دليري مکن لکل مقام | | انوري هم حديث لااحصي |
| چه کشي از پي قبولش لام | | سخنت چون الف ندارد هيچ |
| با کفت هست التيام لام | | اي جوادي که ازدحام سحاب |
| تا به اعراض باقيند اجسام | | تا به اجسام قائمند اعراض |
| بيتو اعراض را مباد قيام | | بيتو اجسام را مباد بقا |
| تازه باد و عدم گرفته ز کام | | گل عز تو در بهار وجود |
| با حسودت زمانه سخت لگام | | با مرادت سپهر سست مهار |
| خضرتت را سيادت از خدام | | درگهت را سياست از حجاب |