در ستایش هیچ
در ستایش هیچ/
| •پدید اورندگان : | سعید رضوانی , |
| •ناشر : | موسسه انتشارات نگاه |
| •سال نشر : | 1385 |
| • نوع کتاب : | تالیف |
| • رده سنی : | 0 |
| • تیراژ : | 4200 |
| • نوع جلد : | گالینگور |
| • شابک : | 964-351-302-5 |
| • تاریخ نشر : | 1385/8/23 |
| • محل نشر : | تهران |
| • زبان : | فارسی |
| • زبان اصلی : | |
| • تعداد صفحات : | 110 |
| • قیمت : | 0 |
| • نوبت چاپ : | 1 |
| • قطع : | رقعی |
| • شماره جلد : | 0 |
| • چکیده : | ,"این مجموعه، متضمن اشعاری است در قالب نو با عناوینی همچون: "طلسم"، "درنا"، "كسوف"، "جادو" و "اثیری". در یكی از قطعات میخوانیم: عشقت/ بهای خسران بودن است،/ حاصل سالیانم نه،/ كه سال بیتو همه سال/ بر كشتگاهم/ مترسك خمیازه میكشید./ به پشیانی نامت،/ خوب بیریاضیت،/ تقدیس قدمم شد/ بر راه بیتقدس،/ همچنان در گوش كلامت/ ترانهی تسلیم باد،/ كه دشوار باید رفت/." |
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