| عصمةالدين شرف داد و دول | | مرحبا موکب خاتون اجل |
| وانکه بردست بدايت به ازل | | آنکه بردست نهايت به ابد |
| وان به قدر و به شرف بر ز زحل | | آن به جاه و به هنر به ز فلک |
| با خلافش اسد چرخ حمل | | با وفاقش الم دهر شفا |
| وي به انواع شرف گشته مثل | | اي به اجناس هنر گشته سمر |
| چرخ نتواندت آورد بدل | | دهر نتواندت آورد نظير |
| دهر با عدل تو خالي ز خلل | | چرخ با جود تو ايمن ز نياز |
| در نطقت همه وحي منزل | | نقش کلکت همه در منظوم |
| با وقار تو زمين يک خردل | | با کمال تو فلک يک نقطه است |
| دور دارد ز جهان دست اجل | | دست عدل تو اگر قصد کند |
| جز خداوند جهان عزوجل | | از خداوندان برتر ز تو نيست |
| وي بر از گنبد اعظم به محل | | اي مه از گوهر آدم به شرف |
| مشکل چرخ کند کلک تو حل | | تيغ مريخ کند قهر تو کند |
| متهم نيست به تقصير و کسل | | بنده هرچند به خدمت نرسد |
| آن رسيده است که زان لاتسال | | اندرين سال که بگذشت برو |
| عزلها يافته بيهيچ عمل | | بندها داشته بيهيچ گناه |
| وين همه پوست چو ترکيب بصل | | آن همه مغز چو تجويف دماغ |
| تا برستست از آن ويل و وجل | | قرب ماهي نبود بيش هنوز |
| تا چو آخر نبود هيچ اول | | تا به اول نرسد هيچ آخر |
| شب و روزت چو شب و روز امل | | باد بياول و آخر همه عمر |
| زهر در کام مطيع تو عسل | | نوش در کام حسود تو شرنگ |
| لنگ در تربيت خصمت و شل | | پاي دور فلک و دست قضا |