| اي نکوسيرت خجسته رسوم | | آفرين باد بر چو تو مخدوم |
| وي بمعني وراي سير نجوم | | اي بصورت فرود دور فلک |
| خرج جود تو بر خصوص و عموم | | دخل مدح تو از خواص و عوام |
| هيچ سيرت که آن بود مذموم | | خلق ناديده در جبلت تو |
| که دهند آفتاب را مرسوم | | راست استاد کار آن ديوان |
| زر شد از مهر خاتمت مختوم | | همتت پشت دست زدکان را |
| ز انگبين کي کناره کردي موم | | گر نبودي ز عشق نقش نگينت |
| معني مکرمت نشد مفهوم | | تا قدم در وجود ننهادي |
| اين چه خاصيت است و اين چه قدوم | | اي عجب لا اله الا الله |
| از جهان رسم روزي مقسوم | | پاک برداشتي به قوت جود |
| حشو گردون دون و عالم لوم | | دست فرسود جود تو شده گير |
| کابر و دريا معاتباند و ملوم | | پيش دست و دلت چهل سالست |
| ذوق داند لطيفهاي طعوم | | تو شناسي دقيقهاي سخا |
| صفر پيشي دهد بلي به رقوم | | بخششت گاه نيستي پيشي است |
| وي جهانت ز خادمان خدوم | | اي سپهرت ز بندگان مطيع |
| حملهي باز بين و حيلهي بوم | | گر حسودت بسي است باکي نيست |
| شک مکن حرفها بود موهوم | | خصم را در ازاء قدرت تو |
| در موازات قهر باد سموم | | ليک چونان که دفع بوي پياز |
| کز هزارت يکي شود معلوم | | آمدم با حديث خويش و مباد |
| نه چو ما بلکه قايمي قيوم | | به خدايي که قايمست به ذات |
| جان ز غم مظلم است و تن مظلوم | | که مرا در فراق خدمت تو |
| تا که از خدمتت شدم محروم | | باز مرحوم روزگار شدم |
| روزگارش چنين کند مرحوم | | هرکه محروم شد ز خدمت تو |
| پدرم هم جهول بود و ظلوم | | ظلم کردم ز جهل بر تن خويش |
| زان همه کارها يکي منظوم | | اي دريغا که جز سخن بنماند |
| وان چو معلوم صوفيان شده شوم | | هين که معلومم از جهان جانيست |
| حاش للسامعين چه غم که غموم | | باز خر زين غمم چه ميگويم |
| جز بدين بندگي نيم موسوم | | گرچه در فوج بندگانت نيم |
| باري از هند بودمي وز روم | | فرق اين است کز خراسانم |
| با قضاي فلک قضاي سدوم | | تا بود در قرينه پشتاپشت |
| مجلست از قرين بد معصوم | | جانت باد از قضاي بد محفوظ |
| روز و شب تازه و فنا مزکوم | | گل عز تو بر درخت بقا |
| سال و مه سبز و مهرگان معدوم | | شاخ عمر تو در بهار وجود |