| هم از درد، دل را دوايي نبينم | | به درد دلم کاشنائي نبينم |
| به از درد تسکين فزايي نبينم | | چو تب خال کو تب برد درد دل را |
| کز انده به، انده زدايي نبينم | | شوم هم در انده گريزم ز انده |
| دل آشنا هيچ جايي نبينم | | جهان نيست از هيچ جايي که در وي |
| که هيچ آشنا بيريايي نبينم | | غلط گفتم اي مه کدام آشنايان |
| دمي نگذرد تا جفايي نبينم | | ازين آشنايان که امروز دارم |
| به جائي روم کاشنايي نبينم | | مرا دل گرفت از چنين آشنايان |
| که چون قاف شد جز عنايي نبينم | | چو عنقا من و کوه قافم قناعت |
| که در جويش آب رضايي نبينم | | پل آبگون فلک باد رخنه |
| بجز هاون سرمه سايي نبينم | | در آئينهي دل خيال فلک را |
| به از دل، توکل سرايي نبينم | | کليد توکل ز دل جويم ايرا |
| وليک از درون جز فضايي نبينم | | دري تنگ بينم توکل سرا را |
| ز سوي درون سرمهسايي نبينم | | برون سرمهاي هست بر هاون اما |
| که الا درش تنگنايي نبينم | | توکل سرا هست چو نحلخانه |
| بهار کرم را بهايي نبينم | | منم نحل و ديماه بخل آمد اينجا |
| امان بينم ارچه نوايي نبينم | | چو مار از نهادم چنين به که آخر |
| هم از زخم کس هم بلايي نبينم | | هم از زهر من کس گزندي نبيند |
| به از صبر منزل نمايي نبينم | | بدان تا دلم منزل فقر گيرد |
| به از فقر سرما زدايي نبينم | | بلي از پي چار منزل گرفتن |
| به از سرب، آهنربايي نبينم | | يکي از پي جاي لنگر گرفتن |
| چراغ وفا را ضيايي نبينم | | به صحراي عادي مزاجان عادت |
| طراز کرم را بهايي نبينم | | به بازار خلقان فروشان همت |
| به حي کرم پيشوايي نبينم | | از آن صف پيشين يماني و طائي |
| بجز غمر عمر الردايي نبينم | | وزين بازپس ماندگان قبائل |
| وز آن انجم اکنون سهايي نبينم | | از آن موکب امروز مردي نيابم |
| کز اين چار زن مردزايي نبينم | | محبت نميزايد اکنون طبايع |
| چه جويم که دانم وفايي نبينم | | نه خاقانيم گر وفا جويم از کس |