| عهد نامهي بقا فرستادي | | اي جهان داوري که دوران را |
| مدد از کبريا فرستادي | | وي کيان گوهري که کيوان را |
| راه گير قضا فرستادي | | عزم را چند روزه ره به کمين |
| عدل را پيشوا فرستادي | | پيش مهدي که پيشگاه هدي است |
| رفته را باز جا فرستادي | | آب دين رفته بود از آتش کفر |
| به سلام سها فرستادي | | وقت قدرت سهيل را ز يمن |
| به مصاف و غزا فرستادي | | روز کين اژدهاي رايت را |
| در دم اژدها فرستادي | | کرکسان را ز چرخ چون گنجشک |
| کوه را در هوا فرستادي | | به سم کوه پيکران در رزم |
| آتش اندر وغا فرستادي | | ز آب تيغ کيالواشيري |
| بيم نار بلا فرستادي | | آخر نام خويش را بر چرخ |
| عرشيان را سنا فرستادي | | از سنا برق آتش شمشير |
| دودش اندر سما فرستادي | | شررش در کواکب افکندي |
| کامتحانش از دها فرستادي | | کوه را زهره آب گشت وببست |
| که ثنا را جزا فرستادي | | زهرهي آب گشتهي کوه است |
| که به خلق خدا فرستادي | | ني ني آن زر ز نور خلق تو زاد |
| هم به خورشيد وا فرستادي | | هرچه خورشيد زاده بود از خاک |
| گنج خاقان عطا فرستادي | | اعظم اسپهبدا به خاقاني |
| حلهها بر ملا فرستادي | | بدرهها دادي از نهان و کنون |
| قلزمي از سخا فرستادي | | چشمهها راندي از مکارم و باز |
| مهر و مه بر قفا فرستادي | | اسماني که اختران دادي |
| به رهي بارها فرستادي | | هر زري کافتاب زاد از کان |
| نقد کان را فنا فرستادي | | پس ازين آفتاب بخشي از آنک |
| که مثال رضا فرستادي | | پارم امسال شد به سعي عطات |
| خط حرز و شفا فرستادي | | جان مصروع شوق را ز مثال |
| از قبولم لوا فرستادي | | چو سه حرف ميانهي نامت |
| که دميش از صبا فرستادي | | خاطرم مريمي است حامل بکر |
| صد هزارش دوا فرستادي | | مريمي کش هزار و يک درد است |
| کشته را خون بها فرستادي | | من به جان کشتهي هواي توام |
| تو دو چندان مرا فرستادي | | خون بها گر هزار دينار است |
| من شدم زنده تا فرستادي | | زين صلت کو قصاص کشتن راست |
| که مرا کيميا فرستادي | | گنج عرشي گشايمت به زبان |
| تا مرا توتيا فرستادي | | همه دزدان گنج من کورند |
| که صلت چون نيا فرستادي | | من نيايشگر نياي توام |
| نه به قدر ثنا فرستادي | | بخشش تو به قدر همت توست |
| که سزا را سزا فرستادي | | همچنين بخش تا چنين گويند |
| کاين عطيت به ما فرستادي | | فضل و فطنت سپاسدار تو اند |
| کاين همه زر چرا فرستادي | | نشنوي آنکه حاسدان گويند |
| که به مردم گيا فرستادي | | نفخهي روح اول البشر است |
| به لبي ناشتا فرستادي | | سال قحط انگبين و شير بهشت |
| پيل بالا نوا فرستادي | | ماه دي کرم پيله را از قوت |
| در بن چه ضيا فرستادي | | کرم شبتاب را شب يلدا |
| ز ابر همت نما فرستادي | | در سراب وحش به نيلوفر |
| در زمستان قبا فرستادي | | شاهباز کلاه گمشده را |
| کاين نکوئي کجا فرستادي | | بد نکردي و خود نکو داني |
| داني احسان که را فرستادي | | دانم از جان که را ستودم و باز |
| بر سر بيد پا فرستادي | | افسر زر چو شاه دابشليم |
| گنج بيمنتها فرستادي | | ثاني اسکندري، ارسطو را |
| زر و فر و بها فرستادي | | شاه نعمان کفي و نابغه را |
| خلعه چون مصطفا فرستادي | | مصطفي دولتا سوي حسان |
| هديه چون مرتضي فرستادي | | مرتضي صولتا سوي قنبر |
| که کليد دعا فرستادي | | برگشايم در فلک به دعات |
| تاج عز و علا فرستادي | | باش تاج کيان که بر سر چرخ |
| که در او درد مردمي يابي | | نيک مردي کجاست خاقاني |
| دانه پرورد مردمي يابي | | نيست مرغي که حوصلهش به جهان |
| که در او مرد مردمي يابي | | خود جهان مخنث آن کس نيست |
| ور نکردي خاطر او نور پيوند آمدي | | طبع روشن داشت خاقاني حوادث تيره کرد |
| از خزانهي غيب لفظش وحي مانند آمدي | | گر کليد خاطرش نشکستي اندر قفل غم |
| نخل مومين را رطب شيرين تر از قند آمدي | | گر به اول نستندندي اصل شيريني ز موم |
| تا ز سگان خلق شير شرزه نجويي | | بس کن خاقانيا ز مدحت دونان |
| ز آب خضر کام مار گرزه نشويي | | تا به چنين لفظ نام سفله نراني |
| نذر کن اکنون که بيش هرزه نگويي | | هر زه واحسنت هرزه بود که گفتي |
| مدد ميدهم تا تو تاثير بيني | | ز آب سخن بحر ارجيش را من |
| چو من آمدستم صدف گير بيني | | ازين بحر ماهي گرفتندي اکنون |
| کز سر سودا خرد را در سر آرد خيرگي | | بس کن از سوداي خوبان داشتن خاقانيا |
| کز برون سو روشني دارد درون سو تيرگي | | صورت خوبان به معني چون ببيني آينه است |