| هندوئي را ترک عذرا دادي احسنت اي ملک | | خسروا خاقاني عذرا سخن هندوي توست |
| عنبري را در دريا دادي احسنت اي ملک | | او غلام داغ بر رخ عنبر درگاه توست |
| تا ورا خاتون يغمادادي احسنت اي ملک | | خادمش گردند خاتونان خرگاه فلک |
| در طغان شاهيش طغرا دادي احسنت اي ملک | | برقراخان شب و آقسنقر روز از شرف |
| کز جوار حضرتش جا دادي احسنت اي ملک | | روي در درياي دولت، پشت بر کوه بقا |
| راوقش کردي و بالا دادي احسنت اي ملک | | برگرفتي آب از خاک سيه خورشيدوار |
| شربت عدلش مصفا دادي احسنت اي ملک | | چون ز دار الظلم شروان ناتوانش يافتي |
| خانهي بالاش ماوي دادي احسنت اي ملک | | چون غريبش يافتي چون عقل و چون عقل از جهان |
| پس به دست مرغ گويا دادي احسنت اي ملک | | ساختي کاخ سليمان جاي بانوي سبا |
| خانهي رستم به عنقا دادي احسنت اي ملک | | مرغ را ديدي که عنقا مهر و زال انديشه بود |
| سيستان را بهمنآسا دادي احسنت اي ملک | | بهمن اسفندياري کاخ رستم سيستان |
| حور گندمگون حسنا دادي احسنت اي ملک | | خانه چون خلد است و من چون آدمم زيرا مرا |
| خلد بخشيدي و حورا دادي احسنت اي ملک | | نايب يزدان توئي امروز و چون يزدان مرا |
| يک صدف ني و صد هزار نهنگ | | همه درگاه خسروان درياست |
| نفکند هيچ صاحب فرهنگ | | کشتي آرزو درين دريا |
| هر زمان باشدش هزار آهنگ | | يک گهر ندهد و به جان ستدن |
| گردن آز راست پالاهنگ | | در پناه خرد نشين که خرد |
| تو و ناني، مه مير و مه سرهنگ | | تو و گنجي، مه صدر و مه ايوان |