| رخ سوي يار دگر نتوان کرد | | از در يار گذر نتوان کرد |
| بر سر کوش گذر نتوان کرد | | ناگذشته ز سر هر دو جهان |
| صبر ازين بيش مگر نتوان کرد | | زان چنان رخ، که تمناي دل است |
| به چنان روي نظر نتوان کرد | | با چنين ديده، که پرخوناب است |
| ياد حلوا و شکر نتوان کرد | | چون حديث لب شيرينش رود |
| دل ازين شيفتهتر نتوان کرد | | سخن زلف مشوش بگذار |
| راز خود جمله سمر نتوان کرد | | قصهي درد دل خود چه کنم؟ |
| از طرب بيش حذر نتوان کرد | | غم او مايهي عيش و طرب است |
| غمش از سينه به در نتوان کرد | | گرچه دل خون شود از تيمارش |
| که از آن هيچ خبر نتوان کرد | | ابتلايي است درين راه مرا |
| محنت آباد مقر نتوان کرد | | گفتم: اي دل، بگذر زين منزل |
| زود از آنجاي سفر نتوان کرد | | گفت: جايي که عراقي باشد |