| بوالمفاخر امير فخرالدين | | افتخار زمان و فخر زمين |
| وانکه در کلک او هنر تضمين | | آنکه در دست او سخا مضمر |
| آفتابيست آسمانش زين | | آسمانيست آفتابش راي |
| خاکبوسند اختران به جبين | | آن بلنداختري که پيش درش |
| کرده حرفش به گفتهها تحسين | | گفته عقلش به کردها احسنت |
| دفتر تير چرخ را تزيين | | آن دبيرست کز قلم بفزود |
| به ترازوي حرصبر شاهين | | وان جوادست کز سخا بشکست |
| حصنها ساخت روزگار حصين | | در زواياي دولت از حزمش |
| مايها کرد آفتاب عجين | | در مواليد عالم از جودش |
| در رباط کواکب افتد چين | | گر عنان فلک فرو گيرد |
| شبش از روز بگسلد در حين | | ور زمام زمانه باز کشد |
| رخت بردارد از طبيعت کين | | هرکجا سايه افکند از حلم |
| قفل بيزار گردد از زرفين | | هرکجا باره برکشد از امن |
| دست يابد تذور بر شاهين | | عدل او دست اگر دراز کند |
| نقش با مهر گل فرستد طين | | سهمش ار مهر بر حواس نهد |
| وي ترا امر بر شهور و سنين | | اي ترا حکم بر زمين و زمان |
| به يمين تو جود خورده يمين | | ز يسار تو دهر برده يسار |
| نور ظن تو رهنماي يقين | | نوک کلک تو رازدار قضا |
| فلک از گردن و جهان ز سرين | | طوق و داغ ترا نماز برند |
| آفتاب دگر شود پروين | | گر ز راي تو قوتي يابد |
| خاک سر برکشد به عليين | | ور ز قدر تو تربيت بيند |
| در مقادير کارها تلقين | | آسمان را زبان کلک تو داد |
| ساز صورتگران فروردين | | آفتاب از بهشت بزم تو برد |
| که خردشان نميکند تعيين | | ذات تو عين عقل گشت چنان |
| نتواند که گويد اينک اين | | نتواند که گويد آنک آن |
| شير رايت شود چو شير عرين | | چون تو گردند حاسدانت اگر |
| به ورم کي شود نزار سمين | | به حسدکي شود ضعيف قوي |
| که بود با انامل تو قرين | | يارب آن نقشبند مصري چيست |
| فتنه را خواب و ملک را تسکين | | هست بيدار و بيقرار و ازوست |
| گنجها دارد از علوم دفين | | هست عريان و در صريرش عقل |
| سيرش از چرخ ملک ديو لعين | | نه شهابست و بفکند هر روز |
| نوکش از بحر غيب در ثمين | | نيست غواص و برکشد هردم |
| وي ترا مهر چرخ مهر نگين | | اي ترا طرف چرخ طرف ستام |
| در مديح تو شعرهاي متين | | داشت انديشه کارد از پي مدح |
| چونخط و زلف تو خوش و شيرين | | واندر ابيات او معاني بکر |
| که مرو را عزيمتيست چنين | | چون چنان ديد روزگار خسيس |
| وز جفا بر تنش گشاد کمين | | از حسد در دلش کشيد کمان |
| تا دل از نايبات ماند حزين | | تا تن از حادثات گشت ضعيف |
| به دلش زد به جنبش فرزين | | وانچنان سير چون رخ شطرنج |
| که به جاه تو دارد اين تمکين | | آخر اين روزگار جافي را |
| که چه ميخواهد از من مسکين | | خود نپرسي يکي ز روي عتاب |
| آستان تو باشدم بالين | | تا چو زين بسترم خلاص دهد |
| تا زمان را گذشتنست آيين | | تا زمين را طبيعتست آرام |
| وز زمينت به مهر باد آمين | | از زمانت به خير باد دعا |
| ايزدت يار باد و چرخ معين | | عالمت بنده باد و دهر غلام |