| جز در کنف امان ندارد | | روي تو رخان عاشقان را |
| جز چون ره کهکشان ندارد | | بيجادت چشم بيدلان را |
| چه سود که ريسمان ندارد | | با نور تو ماه را کلاوهش |
| هرگز سر آسمان ندارد | | خورشيد که يافت خاک کويت |
| زان پس دل بوستان ندارد | | گلنار که ديد رنگ رويت |
| آن دارد آن که کان ندارد | | اي آنکه جمالت از گهرها |
| «آن» داري و يوسف «آن» ندارد | | از يوسف خوشتري که در حسن |
| جز عيسي ناتوان ندارد | | درد تو بر آسمان چارم |
| جز چون خم طيلسان ندارد | | رخسار تو قد گردنان را |
| باميست که نردبان ندارد | | با ناز و کرشمهي تو وصلت |
| باغي ست که باغبان ندارد | | بي خوي خوش آن لطيف رويت |
| کز زلف تو بوي جان ندارد | | در عالم عشق کو نسيمي |
| چه سود که پاسبان ندارد | | با عشق تو عقل را خزينهش |
| گر سود کند زيان ندارد | | با دولت تو سيه گليمي |
| نقشيست که جاودان ندارد | | خوش زي که جمال اين جهاني |
| کز حسن فلان نشان ندارد | | اي از پس پرده چند گويي |
| گستاخ بگو فلان ندارد | | چون روي نمود هر که هستي |
| دارد سخن و دهان ندارد | | در بزم ببين که چون عطارد |
| بندد کمر و ميان ندارد | | در رزم نگر که همچو جوزا |
| انصاف بده چنان ندارد | | دارد همهچيز جان وليکن |
| آن دارد آن که آن ندارد | | اي آنکه ز وصف تو سنايي |
| تير تو چنو کمان ندارد | | بيقامت خود مدارش ايرا |
| هرگز سبکي گران ندارد | | زين گونه گراني از سنايي |
| حيست يکي که جان ندارد | | بلبل به ميان گل چه گويد |
| کز فصل کسي زيان ندارد | | ما طاقت عدل تو نداريم |
| وي جوان از تو سپهر سالخورد | | اي چو عقل از کل موجودات فرد |
| روشنان کارگاه لاجورد | | خاکبوسان سر کوي تواند |
| چرخ و خورشيد و مه گيتي نورد | | پاسبانان در و بام تواند |
| مجد کو تا گويدش کز راه برد | | تا سنايي کيست کايد بر درت |
| وي همه گردون چه خواهي کرد گرد | | اي همه دريا چه خواهي کردنم |
| کز حکيمان او زياد اندر نبرد | | نام او ميدان و نقش او بسي |
| پيش بينا مرد عريان روي زرد | | زان به خدمت نامدم زيرا بود |
| کو بماندست از رخ خورشيد فرد | | کز ضعيفي ديدگان شب پرهست |
| وز دم خرسندي آنرا کرده سرد | | ساختم جلابي از جان جانت را |
| مي بخردان مان و گرد ميمگرد | | چون بزرگان نوش کن جلاب جان |
| بوالهوس جويد به مجلس خارورد | | ورد جويد روز مجلس مرد عقل |
| گر نگيرم انس با من بد مگرد | | زان که مقلوب سنايي يانس است |
| خويشتن را باژگونه کس نکرد | | انس گيرم باژگونه خوانيم |
| عذرشان بپذير کمتر کن نبرد | | گر تن و جانم به خدمت نامدند |
| روي تو مهرست و جان را چشم درد | | صدر تو چرخست و تن را بال سست |
| هر زمان گويد: زهي آزادمرد | | جان من آزاد کن تا عقل من |
| دل بي لطف تو جان ندارد | | تازه گردانم بنا جستن که باد |
| نايد ز کمال عقل عقلي | | جان بي تو سر جهان ندارد |
| نايد ز جمال روح روحي | | تا نام تو بر زبان ندارد |
| جز در خم زلف دلفريبت | | تا عشق تو در ميان ندارد |
| روح ار چه لطيف که خداييست | | روحالقدس آشيان ندارد |
| عقل ار چه بزرگ رهنماييست | | بي نطق تو خانمان ندارد |
| زلف تو يقين عاقلان را | | بي مدح تو آب و نان ندارد |
| تازه از جان بيخ و شاخ و برگ و ورد | | جز در کفن گمان ندارد |