| هر که نابينا بود بينا شود | | گر نسيم يوسفم پيدا شود |
| بويي از پيراهنش پيدا شود | | بس که پيراهن بدرم تا مگر |
| زاهد منکر سر غوغا شود | | گر برافتد برقع از پيش رخش |
| دل ز زلفش کافري يکتا شود | | ور برافشاند سر زلف دو تا |
| بيشک آن دل ممني حقا شود | | هر دلي کز زلف او زنار ساخت |
| عقل از لايعقلي رسوا شود | | گر بيابد عقل بوي زلف او |
| هر که او مشغول اين سودا شود | | از دو عالم فارغ آيد تا ابد |
| دل چرا شوريده و شيدا شود | | گر کسي پرسد که پيش روي او |
| ذره سرگردان و ناپروا شود | | تو جوابش ده که پيش آفتاب |
| از چنين دريا کسي تنها شود | | اي دل از دريا چرا تنها شدي |
| ميدود تا زودتر آنجا شود | | هر که دور افتد ز جاي خويشتن |
| ميطپد تا چون سوي دريا شود | | ماهي از دريا چو بر خاک اوفتد |
| کارت اي غافل کجا زيبا شود | | گر تو بنشيني به بيکاري مدام |
| گوهري بيمثل و بيهمتا شود | | گر دل عطار با دريا رسد |