| که من از جان غلامت را غلامم | | کجايي ساقيا مي ده مدامم |
| که از خون جگر پر گشت جامم | | ميم در ده تهي دستم چه داري |
| که من بي روي تو خسته روانم | | چه ميخواهي ز جانم اي سمن بر |
| تمامم کن که رندي ناتمامم | | چو بر جانم زدي شمشير عشقت |
| من مسکين ندانم تا کدامم | | گهم زاهد همي خوانند و گه رند |
| چو من مردم چه مرد ننگ و نامم | | ز ننگ من نگويد نام من کس |
| نخواهد بود جز آتش مقامم | | ز من چو شمع تا يک ذره باقي است |
| بيا تا خوش بسوزم زانکه خامم | | مرا جز سوختن کاري دگر نيست |
| دريغ افتد چنين مرغي به دامم | | دل عطار مرغي دانه چين است |