| سرمهي چشمم ز خاک پاي تو | | اي دلم مستغرق سوداي تو |
| عاشق ياقوت جان افزاي تو | | جان من من عاشقم از ديرگاه |
| فتنهي آن نرگس رعناي تو | | مانده کرده عالمي دل ديده را |
| دل نبودي اين چنين شيداي تو | | گر چنين زيبا نبودي عارضت |
| باد ايثار رخ زيباي تو | | صد هزاران جان عاشق هر نفس |
| تا بديدم قامت و بالاي تو | | از دل من جوي خون بالا گرفت |
| زان شدم يکباره ناپرواي تو | | نيست يک ذره تو را پرواي خويش |
| غرقه گشتم در بن درياي تو | | دست گير آخر مرا از بي دلي |
| تا بگويم قصهي سوداي تو | | با تو ميبايد به کام دل مرا |
| عرضه خواهد داشتن بر راي تو | | قصهي عطار چون از سر گذشت |