| سرم زين بيش سودا برنتابد | | دلم زين بيش غوغا برنتابد |
| که آن ديوانه يغما برنتابد | | غمت را گو بدار از جان ما دست |
| غمي کان سنگ خارا برنتابد | | ز شوقت بر دل ديوانهي ماست |
| چنان سيلي که دريا برنتابد | | ز چشمم هر شبي مژگان براند |
| دگر امروز و فردا برنتابد | | بيا امشب مگو فردا که اين کار |
| اگر زلفت سر از ما برنتابد | | سر اندر پايت اندازيم چون زلف |
| چو درد دل مداوا برنتابد | | عبيد از درد کي يابد رهائي |