| که ترا من به دوست خواهم داد |
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اي دل من ترا بشارت داد |
| شاد باد آنکه تو بدويي شاد |
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تو بدو شادمانهاي به جهان |
| که کسي دل به دوست نفرستاد |
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تا نگويي که مر مرا مفرست |
| رو بر دوست هر چه باداباد |
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دوست از من ترا هميطلبد |
| زير آن زلفکان چون شمشاد |
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دست و پايش ببوس و مسکن کن |
| از لب لعل او بيابي داد |
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تا ز بيداد چشم او برهي |
| نپسندد به هيچ کس بيداد |
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زلف او حاجب لبست و لبش |
| آفرينهاي خواجه داري ياد |
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خاصه بر تو که تو فزون ز عدد |
| خواجهي پاکطبع پاکنژاد |
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خواجهي سيد ستوده هنر |
| هيچ مادر چو او کريم نژاد |
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عبد رزاق احمد حسن آنک |
| بر بساط زمين قدم ننهاد |
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آنکه کافيتر و سخيتر ازو |
| دل او راد و دست چون دل راد |
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خوي او خوب و روي چون خو خوب |
| از دل پاک خواجه را استاد |
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کافيان جهان هميخوانند |
| که ندانست روزگار گشاد |
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بستههايي گشاده گشت بدو |
| بر بساط جم و بساط قباد |
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از وزيران چو او يکي ننشست |
| سخني را که او نهد بنياد |
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فيلسوفي به سر نداند برد |
| نرم گرداند آهن و پولاد |
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به سخن گفتن آن ستوده سخن |
| کو رسد راد مرد را فرياد |
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راد مردان بدو روند همي |
| هر که از پايگاه خويش افتاد |
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زو تواند به پايگاه رسيد |
| کار ويران خويش کرد آباد |
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بس کسا کو به فر دولت او |
| غمگنان را ز غم کنند آزاد |
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خانهي او بهشت شد که درو |
| هست پاداش خدمتي هفتاد |
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نزد آن خواجه خادمانش را |
| هيچ مادر چنو کريم نزاد |
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هيچ شه را چنين وزير نبود |
| که به شادي هزار سال زياد |
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جمع شد نزد او هزار هنر |
| هر دو خوانند خواجه را داماد |
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پدر و مادر سخاوت و جود |
| چون مغان پيش آذر خرداد |
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پيش دو دست او سجود کنند |
| به در کاخ او فرو استاد |
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هر که او معدن کريمي جست |
| لقب او خليفهي بغداد |
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آفتاب کرام خواهد کرد |
| تا به دي ماه سرد گردد باد |
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تا به مرداد گرم گردد آب |
| باغهاي چو بتکدهي نوشاد |
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تا به وقت خزان چو دشت شود |
| دشمنش مستمند چون فرهاد |
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با دل شاد باد چو شيرين |
| مهرگان فرخ و همايون باد |
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روزگارش خجسته باد و بر او |